Shankaracharya Avimukteshwaranand
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BJP Insults Shankaracharya Avimukteshwaranand: मंदिर तोड़े जा रहे हैं, संतों के साथ दुर्व्यवहार हो रहा है। हिंदुओं की आस्था के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। क्या इसी को रामराज्य कहते हैं? क्योंकि हमसे तो राम राज्य का वादा किया गया था। पर यहां हालात एकदम वैसे नजर आ रहे हैं, जैसे औरंगजेब के समय थे। फिर हम इसे रामराज्य कैसे मानें?
क्या मोदी सरकार में रामराज्य की परिभाषा बदल गई है या फिर जनता से फरेब किया गया? वो सनातन की रक्षा का वादा भी आपके हर एक वादे की तरह झूठा था। आज हिंदू धर्म में सबसे पवित्र और महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक प्रयागराज में एक शंकराचार्य का अपमान किया जा रहा है। उनसे उनकी पहचान साबित करने को कहा जा रहा है।
योगी सरकार का नोटिस और Shankaracharya पर सवाल
यूपी की योगी सरकार अब शंकराचार्य (Shankaracharya) स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ खुलकर आ गई है। प्रयागराज मेला प्राधिकरण ने अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य पद पर सवाल उठाते हुए उन्हें नोटिस भेजा है और 24 घंटे में यह साबित करने के लिए कहा है कि बताइए आप असली शंकराचार्य हैं।

नोटिस में लिखा है– “शंकराचार्य पद का मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। जब तक एससी से कोई आदेश नहीं होता, तब तक धर्माचार्य ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य के रूप में कोई भी व्यक्ति पट्टाभिषेक नहीं हो सकता। जबकि माघ मेला शिविर के बोर्ड में आपने खुद को शंकराचार्य घोषित कर रखा है। इससे सुप्रीम कोर्ट की अवहेलना हो रही है। इसलिए 24 घंटे में बताएं कि शंकराचार्य शब्द का प्रयोग कैसे किया जा रहा है।”
सरकार का अपमान और शिष्यों के साथ मारपीट
मतलब पहले तो बीजेपी सरकार ने नियमों का बहाना बनाकर शंकाराचार्य (Shankaracharya) अविमुक्तेश्वरानंद का अपमान किया। उनके शिष्यों को घसीट-घसीटकर पीटा गया। उनकी चोटियां पकड़कर उन्हें खींचा गया। उन्हें गंगा स्नान करने से रोक दिया गया। और अब उनके पद पर ही सवाल खड़े कर दिए गए हैं। हालांकि शंकराचार्य भी हार मानने वालों में से नहीं हैं। उन्होंने योगी सरकार के इस नोटिस का मुंहतोड़ जवाब दिया है। शंकराचार्य ने साफ कहा है कि- “भारत के राष्ट्रपति को भी ये अधिकार नहीं है कि वो तय करे कि कौन शंकराचार्य है? शंकराचार्य का निर्णय शंकराचार्य करते हैं।”
‘Shankaracharya’ पद की ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व
जान लीजिए कि शंकराचार्य का पद भारत की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित आध्यात्मिक संस्था है, जिसे आदि शंकराचार्य ने शुरू किया था। शंकराचार्य को सनातन धर्म के सर्वोच्च आचार्य और संरक्षक कहा जाता है। यह पद केवल धार्मिक नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक भी है। और आज शंकाराचार्य के पद पर सवाल खड़ा करके बीजेपी सरकार ने हिंदू धर्म की आस्था पर भी सवाल खड़ा कर दिया है।
18 जनवरी की घटना
बता दें कि 18 जनवरी की सुबह जब संगम तट पर जगतगुरु शंकराचार्य (Shankaracharya) अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने शिष्यों के साथ शाही स्नान के लिए निकले, तब उनकी पालकी पुलिस ने रोक दी। पुलिस ने उनसे पैदल संगम जाने को कहा। जबकि हम सब जानते हैं कि शंकराचार्यों की अपनी परंपराएं होती हैं। उनके रथ, सिंहासन, और डोली हर जगह साथ ही चलते हैं।
उदाहरण के लिए आप इस वीडियो को देखिए। ये वीडियो 13 जुलाई 2024 की है, जब मुकेश अंबानी के बेटे की शादी थी। वीडियो में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, पीएम मोदी के गले में माला पहनाकर उन्हें आशीर्वाद दे रहे हैं। यहां भी आप देख सकते हैं कि अंबानी के घर में भी शंकराचार्य अपने सिंहासन पर बैठे हैं। वरना क्या अंबानी के घर में बढ़िया सोफे/कुर्सी की कोई कमी थी? पर नहीं, शंकराचार्य ने यहां अपनी परंपरा का पालन किया। आप इसी से समझ सकते हैं कि एक शंकराचार्य के लिए उनके सिंहासन या रथ का क्या महत्व है।
योगी सरकार की भूमिका और शंकराचार्य का धरना
तो सवाल उठता है कि क्या खुद को संत बताने वाले योगी आदित्यनाथ ये महत्व नहीं समझ पाए, जो उनकी पुलिस ने शंकराचार्य को रथ से उतरकर जाने को कह दिया। प्रशासन की गलतियां यहीं नहीं रुकी। इसके बाद पुलिसवालों ने शंकराचार्य के शिष्यों के साथ मारपीट की। उन्हें घसीटा गया। कई शिष्यों को तो हिरासत में भी ले लिया गया।
इस घोर अपमान के बाद शंकराचार्य ने गंगा स्नान करने से मना कर दिया। वो धरने पर बैठ गए। आज 3 दिन हो चुके हैं उन्हें धरने पर बैठे। उनका साफ कहना है कि प्रशासन के माफी न मांगने तक हम अपने आश्रम में प्रवेश नहीं करेंगे। फुटपाथ पर ही रहेंगे। उन्होंने ये तक कह दिया है कि- मैं प्रण लेता हूं कि हर मेले के लिए प्रयागराज आऊंगा, लेकिन कभी भी शिविर में नहीं, फुटपाथ पर रहूंगा। संतों के इस देश में आज संतों के साथ ही ऐसा बर्ताव किया जा रहा है। शायद इसी दिन के लिए जनता ने मोदी सरकार को चुना था।
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