Sonam Wangchuk
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Sonam Wangchuk को लेकर 2 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में जो कुछ भी हुआ, उसने लोकतंत्र के दावों की पोल खोलकर रख दी है। अदालत के कटघरे में खड़ी केंद्र सरकार ने बेहद शर्मनाक दलीलें पेश कीं। इस सत्ता के अहंकार में डूबी सरकार का कहना है कि Sonam Wangchuk लद्दाख को नेपाल या बांग्लादेश जैसा बनाना चाहते हैं। सरकार का आरोप है कि वह जहर उगल रहे हैं। सवाल यह उठता है कि जहर कौन उगल रहा है? वह व्यक्ति जिसने देश को विज्ञान और नवाचार के क्षेत्र में इतना कुछ दिया, या वह सत्ता जो सच सुनने की ताकत खो चुकी है?
सत्ता का दोहरा चरित्र और विवादित अतीत
सरकार कहती है कि Sonam Wangchuk जहरीले हैं, लेकिन देश की जनता बेहतर जानती है कि असली जहर कहाँ है। लोग आज भी उस कथित इजरायल वाले वाकये और एप्सटीन फाइल्स के उन दावों को नहीं भूले हैं, जिसे लेकर सोशल मीडिया पर अक्सर मोदी जी की शख्सियत पर सवाल उठते हैं। असल में जहर उन सत्ताधीशों की सोच में है, जो लद्दाख के इस रक्षक को ‘राष्ट्रविरोधी’ साबित करने पर तुले हैं। यह वही सरकार है जिसकी कार्यशैली पर जज लोया केस और गोधरा कांड जैसे गंभीर मामलों के दाग लगे हुए हैं।
चीन के सामने नतमस्तक और अपंग सरकार
आखिर Sonam Wangchuk का असली गुनाह क्या है? क्या उनका अपराध यह है कि उन्होंने चीन के बढ़ते कदमों पर मोदी सरकार को आईना दिखाया? उन्होंने दुनिया को सच बताया कि कैसे चीनी सेना धीरे-धीरे लद्दाख की चारागाह जमीनें निगल रही है। पूरा देश देख रहा है कि चीन का नाम आते ही इस सरकार के हाथ-पैर फूल जाते हैं।
सोनम वांगचुक ने तो बस लद्दाखवासियों के हकों की बात की थी। उन्होंने मांग की थी कि लद्दाख को ‘छठी अनुसूची’ में शामिल किया जाए ताकि वहां की संस्कृति और जमीन सुरक्षित रहे, लेकिन इस सरकार ने उनकी आवाज़ को अनसुना कर दिया।
सितंबर 2025 की हिंसा और साजिश का खेल
जब शांतिपूर्ण तरीकों से बात नहीं बनी, तो सितंबर 2025 में लद्दाख की जनता सड़कों पर उतरी। वहां शांति से प्रदर्शन हो रहा था, लेकिन अचानक हिंसा भड़क गई और 4 बेगुनाह लोगों की जान चली गई। क्या इस हिंसा की जिम्मेदार सरकार नहीं थी? अपनी नाकामी छुपाने के लिए सरकार ने Sonam Wangchuk को बलि का बकरा बनाया। उन पर ‘राष्ट्रीय सुरक्षा कानून’ (NSA) लगाकर उन्हें जोधपुर की कालकोठरी में बंद कर दिया गया।
सरकार का तर्क है कि Sonam Wangchuk ने हिंसा भड़काई। जो इंसान धूप और बर्फ से ऊर्जा बनाने की तकनीक सिखाता हो, वह हिंसा क्यों भड़काएगा? सच तो यह है कि यह हिंसा खुद सरकार ने प्रायोजित की ताकि एक बुलंद आवाज़ को कुचला जा सके।
सुप्रीम कोर्ट में सरकार की नीचता और खामोश लोकतंत्र
अब जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो सरकार ने अपनी नीचता की सारी हदें पार कर दीं। Sonam Wangchuk की तुलना अलगाववादियों से कर दी गई। ऐसा इसलिए क्योंकि मोदी-शाह की जोड़ी को विरोध की आवाज़ बर्दाश्त नहीं होती। जब कोई इनसे कड़वा सच पूछता है, तो इनके कान से खून निकलने लगता है। इनके पास Sonam Wangchuk के सवालों का कोई जवाब नहीं है, इसलिए जेल ही इनका आखिरी हथियार है। एक तरफ चीन सीमा पर अपनी चौकियां मज़बूत कर रहा है और दूसरी तरफ दिल्ली के हुक्मरान केवल एक्टिविस्टों को देशद्रोही घोषित करने की साजिशों में व्यस्त हैं।
क्या वैज्ञानिक को जेल में सड़ाना ही एकमात्र समाधान है?
सवाल यह है कि क्या Sonam Wangchuk जैसे देशभक्त और वैज्ञानिक को जेल में सड़ाकर सरकार को शांति मिलेगी? Sonam Wangchuk ने हमेशा देश के हित की बात की है। उनकी लड़ाई जमीन और पर्यावरण को बचाने की है। लेकिन जो सरकार सच से डरती है, वह इसी तरह का व्यवहार करती है। जनता देख रही है कि कैसे एक नायक को खलनायक बनाने की कोशिश की जा रही है। अंततः इतिहास गवाह रहेगा कि Sonam Wangchuk लद्दाख की आवाज़ थे और रहेंगे, चाहे सत्ता उन्हें कितनी भी प्रताड़ित क्यों न कर ले।
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