Sonam Wangchuk

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Sonam Wangchuk एक ऐसा नाम है जिससे आज दिल्ली के सत्ता के गलियारे असहज महसूस कर रहे हैं। लद्दाख की बर्फीली हवाओं में गूंजता यह सवाल अब पूरे देश में फैल चुका है कि आखिर सरकार उनके साथ क्या करना चाहती है। Sonam Wangchuk ने लद्दाख के अधिकारों के लिए जो मशाल जलाई, उसे दबाने के लिए प्रशासन ने पूरी ताकत झोंक दी है, लेकिन उनकी सच्चाई आज भी सरकार को चुभ रही है।

सुप्रीम कोर्ट में सरकार के दावों की खुली पोल

11 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई ने सरकार के उन तमाम दावों की धज्जियां उड़ा दीं, जो Sonam Wangchuk को एक अपराधी के तौर पर पेश कर रहे थे। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की बेंच ने केंद्र सरकार से वह सवाल पूछा जिसका जवाब सरकारी वकीलों के पास नहीं था। कोर्ट ने सीधे तौर पर पूछा कि आखिर उनके भाषण में हिंसा भड़काने की बात कहाँ की गई है। जब कोर्ट ने खुद भाषण का विश्लेषण किया, तो यह साफ हो गया कि Sonam Wangchuk हिंसा नहीं फैला रहे थे, बल्कि वे उन युवाओं के भविष्य को लेकर चिंतित थे जो सिस्टम की बेरुखी से हारकर गलत रास्ता चुन सकते हैं।

नेपाल-बांग्लादेश का हवाला और सरकारी ‘झूठ’

सरकार ने अदालत में Sonam Wangchuk पर यह गंभीर आरोप लगाया कि वे लद्दाख को नेपाल या बांग्लादेश जैसी स्थिति में धकेलना चाहते हैं। लेकिन असलियत यह है कि Sonam Wangchuk ने केवल एक चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि यदि जनता की लोकतांत्रिक आवाज़ को अनसुना किया गया, तो हालात बेकाबू हो सकते हैं। मोदी सरकार ने इस चेतावनी को ही ‘अपराध’ करार दे दिया। सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों ने सरकार की इस राजनीति का पर्दाफाश कर दिया है।

लद्दाख की ज़मीन और चीनी घुसपैठ का मुद्दा

24 सितंबर 2025 को लेह में हुई हिंसा का ठीकरा सरकार Sonam Wangchuk पर फोड़ रही है। लेकिन सच यह है कि लद्दाख के लोग अपनी ज़मीन और संस्कृति बचाने के लिए सड़कों पर उतरे थे। आज जब चीन लद्दाख की सीमाओं पर घुसपैठ कर रहा है और चरागाहें कम हो रही हैं, तब सरकार मौन साधे हुए है। जब Sonam Wangchuk ने इन नीतियों पर सवाल उठाए, तो उन्हें 26 सितंबर को गिरफ्तार कर जोधपुर की कालकोठरी में डाल दिया गया।

जेल में Sonam Wangchuk की स्थिति पर सवाल

सरकारी वकील अदालत में दावा कर रहे हैं कि Sonam Wangchuk पूरी तरह फिट हैं, लेकिन ज़मीनी खबरें कुछ और ही इशारा कर रही हैं। खबरों के मुताबिक, उन्हें जेल में बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल रही हैं। दूषित पानी और खराब खान-पान की वजह से उनकी सेहत से खिलवाड़ किया जा रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या यह एक पर्यावरणविद् और शिक्षा सुधारक को मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ने की कोई गहरी साजिश तो नहीं है?

कैद में भी जारी है संघर्ष

जेल की सलाखों के पीछे होने के बावजूद Sonam Wangchuk का जज़्बा कम नहीं हुआ है। वे जेल में कैदियों को पैरेंटिंग की शिक्षा दे रहे हैं, किताबें लिख रहे हैं और यहाँ तक कि चींटियों पर अपना रिसर्च भी जारी रखे हुए हैं। Sonam Wangchuk जैसे व्यक्तित्व को डराकर चुप कराना आसान नहीं है।

लोकतंत्र और न्याय की उम्मीद

आज पूरा देश पूछ रहा है कि क्या अपनी ज़मीन बचाने की मांग करना देशद्रोह है? क्या चीन की घुसपैठ पर सवाल उठाना हिंसा भड़काना है? सरकार चाहे जितने भी ‘राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम’ (NSA) लगा दे, लेकिन सच को कैद नहीं किया जा सकता। Sonam Wangchuk के मामले में सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी इस बात का प्रमाण है कि लोकतंत्र में आवाज़ उठाने वालों को दबाना इतना आसान नहीं होगा। आने वाले समय में Sonam Wangchuk की यह लड़ाई भारतीय लोकतंत्र के लिए एक नई दिशा तय कर सकती है।


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