Rahul Gandhi
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Rahul Gandhi ने सुलतानपुर की MP/MLA कोर्ट में 20 फरवरी को एक बार फिर साफ कर दिया कि वे सत्ता के सामने झुकने वाले नहीं हैं।
अदालत में सत्य की दहाड़
8 साल पुराने एक मामले में पेश हुए Rahul Gandhi ने सीना ठोक कर अदालत के सामने कहा कि उनके ऊपर लगे सभी आरोप झूठे हैं और यह पूरा केस सिर्फ और सिर्फ राजनीतिक दुर्भावना का नतीजा है। आखिर Rahul Gandhi ने गलत क्या कहा था? 2018 में कर्नाटक की धरती से उन्होंने सत्ता को सच का आईना ही तो दिखाया था। उन्होंने बस इतना कहा था कि जो पार्टी ईमानदारी की बड़ी-बड़ी बातें करती है, उसके अध्यक्ष खुद हत्या के आरोपी रह चुके हैं।
दोस्तों, याद रहे कि यह कोई मनगढ़ंत बात नहीं थी। साल 2005 के सोहराबुद्दीन शेख कथित एनकाउंटर मामले में अमित शाह पर साजिश रचने और सबूत मिटाने के बेहद गंभीर आरोप लगे थे। Rahul Gandhi ने सार्वजनिक मंच से बस वही तो दोहराया था जो रिकॉर्ड में दर्ज था।
साजिशों का चक्रव्यूह और धमकियों का दौर
लेकिन क्या अब इस देश में सच बोलना भी अपराध हो गया है? बीजेपी चाहे जितनी घेराबंदी कर ले, Rahul Gandhi का रुख स्पष्ट है कि उन्हें सच के लिए कोर्ट के चक्कर मंजूर हैं, पर माफी हरगिज नहीं। आज देश देख रहा है कि कैसे Rahul Gandhi को चौतरफा कानूनी पचड़ों में फंसाया जा रहा है। हद तो तब हो गई जब खुलेआम उन्हें गोली मारने की धमकियां दी जाने लगीं। कर्णी सेना जैसे संगठनों की तरफ से आने वाली ये धमकियां बताती हैं कि सत्ता पक्ष के इशारा पर देश के माहौल को कितना जहरीला बना दिया गया है।
इतना ही नहीं, निशिकांत दुबे जैसे बीजेपी के वो सांसद, जो अपनी बदजुबानी और गालीबाजी के लिए जाने जाते हैं, वे Rahul Gandhi के खिलाफ नोटिस पर नोटिस देते हैं। उनकी मंशा साफ है कि वे चाहते हैं कि Rahul Gandhi पर चुनाव लड़ने को लेकर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया जाए, ताकि संसद में सरकार से कड़वे सवाल पूछने वाला कोई न बचे।
आईटी सेल की विफलता और राष्ट्रवाद की पोल
बीजेपी की आईटी सेल ने सालों तक करोड़ों रुपए फूंककर Rahul Gandhi के पाक-साफ चरित्र पर कीचड़ उछाला। उन्हें ‘पप्पू’ साबित करने की नाकाम कोशिशें कीं। लेकिन जब वे इसमें फेल हो गए, तो अब उन्हें कानूनी मकड़जाल में उलझाकर चुप कराने की साजिश रची जा रही है। आखिर क्यों अचानक Rahul Gandhi इतने खटकने लगे हैं?
इसकी सबसे बड़ी वजह है कि Rahul Gandhi ने संसद के भीतर मोदी सरकार के ‘घटिया राष्ट्रवाद’ की पोल खोल दी है। उन्होंने पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल एम.एम. नरवणे की किताब का जिक्र करते हुए सरकार को बेनकाब कर दिया। नरवणे ने अपनी किताब में साफ लिखा है कि कैसे चीनी टैंक भारतीय सीमा के अंदर तक आ गए थे और हमारी जमीन पर कब्जा करने की कोशिश हुई थी। Rahul Gandhi ने सवाल पूछा कि जब चीन हमारे घर में घुस रहा था, तब मोदी सरकार लाल आंखें दिखाने के बजाय चुप्पी क्यों साधे हुए थी।
रणभूमि में सेना को अकेला छोड़ने का आरोप
पूर्व सेनाध्यक्ष नरवणे ने अपनी किताब में लिखा था कि जब चीनी टैंक को भारत की सीमा के करीब आता देखा गया था, तो नरेंद्र मोदी और राजनाथ सिंह को जानकारी दी गई थी। लेकिन मोदी जी ने कहा था कि जैसा ठीक लगे, देख लो। मतलब कि नरवणे को असमंजस में डालकर युद्ध जैसी गंभीर स्थिति में बीच रणभूमि में सेना को अकेला छोड़ दिया गया था। और ये कहते हैं कि ये लोग राष्ट्रवादी हैं।
Rahul Gandhi सिर्फ सरहद की ही बात नहीं कर रहे, वे देश के अन्नदाता की लड़ाई भी लड़ रहे हैं। उन्होंने अमेरिका के साथ हुई ट्रेड डील पर जो सवाल उठाए हैं, उससे मोदी सरकार के पसीने छूट रहे हैं।
अन्नदाता के साथ विश्वासघात और सरकार का डर
इस डील के तहत अमेरिकी सामानों पर टैरिफ यानी टैक्स को ना के बराबर कर दिया गया है। Rahul Gandhi ने आगाह किया है कि अगर अमेरिका के कृषि उत्पाद भारत में सस्ते दामों पर बिकने लगेंगे, तो हमारे देश के किसानों की हालत और भी गंभीर हो जाएगी। देश का किसान पहले ही कर्ज और बदहाली से जूझ रहा है, और मोदी सरकार ने अपनी विदेश नीति के चक्कर में किसानों की पीठ में छुरा घोंप दिया है।
असल में बात यह है कि Rahul Gandhi लगातार मोदी सरकार के कुकर्मों की पोल खोल रहे हैं। चाहे वो महंगाई हो, बेरोजगारी हो या फिर सीमा सुरक्षा का मुद्दा हो, मोदी सरकार इन सवालों से डरी हुई है और परेशान भी है। इसीलिए वे चाहते हैं कि विपक्ष के नेता को अदालतों और मुकदमों में इतना उलझा दिया जाए कि वे जनता की आवाज न उठा सकें।
सरकार चाहती है कि देश के लोग असल मुद्दों से भटक जाएं और वे अपनी घटिया राजनीति की रोटियां सेंकते रहें। लेकिन उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि Rahul Gandhi अब वो पुराने वाले राहुल नहीं हैं। वे अब झुकने वाले नहीं हैं, बल्कि हर वार का जवाब दुगनी ताकत से देने के लिए तैयार हैं।
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