Assam
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Assam में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर एक ताजा चुनावी सर्वे के आंकड़े सामने आए हैं, जो बीजेपी के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं हैं। इस सर्वे के मुताबिक, 126 सीटों वाली असम विधानसभा में बीजेपी महज 30 सीटों पर सिमटती दिख रही है। यह आंकड़ा चौंकाने वाला इसलिए है क्योंकि फिलहाल बीजेपी के पास अपनी 60 सीटें हैं और गठबंधन को मिलाकर वह 75 के आंकड़े पर काबिज है।
लेकिन सर्वे कह रहा है कि बहुमत के 64 के आंकड़े से बीजेपी इस बार बहुत दूर रह सकती है। जनता का मिजाज बदला हुआ नजर आ रहा है और सत्ता विरोधी लहर साफ दिखाई दे रही है। सर्वे इशारा कर रहा है कि Assam की राजनीति में एक बड़ा सत्ता परिवर्तन होने जा रहा है।
निचले Assam और बराक घाटी में बदलता समीकरण
Assam के निचले इलाकों में समीकरण पूरी तरह बदल चुके हैं। धुबरी, गोलपारा और बरपेटा जैसे जिलों में जहाँ पिछली बार बीजेपी ने सेंधमारी की थी, वहां अब कांग्रेस अपने नए सहयोगियों और क्षेत्रीय पार्टियों के साथ मिलकर कड़ी चुनौती दे रही है। कांग्रेस इन इलाकों में फिर से मुख्य भूमिका में लौट आई है।
वहीं बराक घाटी, जिसे बीजेपी का अभेद्य किला माना जाता था, वहां भी दरारें साफ नजर आ रही हैं। करीमगंज, कछार और हैलाकांडी जैसे जिलों में परिसीमन के बाद सीटों का गणित उलझ गया है। कांग्रेस ने यहाँ स्थानीय संगठनों के साथ हाथ मिलाकर अपना जनाधार काफी बढ़ा लिया है। अब यहाँ मुकाबला एकतरफा नहीं रहा, बल्कि कांग्रेस और AIUDF के अलग होकर लड़ने के बावजूद त्रिकोणीय संघर्ष में बीजेपी फंसती नजर आ रही है।
ऊपरी असम में CAA और चाय बागान श्रमिकों की नाराजगी
ऊपरी Assam, जो पारंपरिक रूप से बीजेपी और असोम गण परिषद का गढ़ रहा है, वहां भी इस बार हवा का रुख अलग है। 2016 और 2021 में जिस क्षेत्र ने बीजेपी को क्लीन स्वीप दिया था, वहां आज नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA और चाय बागान श्रमिकों के मुद्दों को लेकर भारी नाराजगी है। स्थानीय आबादी को लग रहा है कि उनकी पहचान और अधिकारों के साथ खिलवाड़ हुआ है।
कांग्रेस ने इस मौके को भांपते हुए ‘असम बचाओ’ जैसे अभियानों के जरिए अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। जोरहाट जैसी महत्वपूर्ण सीटों पर कांग्रेस की पकड़ फिर से मजबूत हुई है और बीजेपी के लिए अपनी पुरानी सीटों को बचाना भी अब एक बड़ी चुनौती बन गया है।
हिमंता बिस्वा सरमा की ‘मिया’ राजनीति और जनता का आक्रोश
Assam में बीजेपी की इस कमजोर होती स्थिति के पीछे मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा की विवादित बयानबाजी का भी बड़ा हाथ माना जा रहा है। हिमंता ने जिस तरह अल्पसंख्यक मुसलमानों को ‘मियां’ कहकर संबोधित किया और उन्हें सार्वजनिक मंचों से बेइज्जत करने की कोशिश की, उसने राज्य के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाया है। धौलपुर जैसी हिंसक घटनाएं, जहां बेदखली के नाम पर गोलियां चलीं और लोगों को बेघर किया गया, उसने जनता के एक बड़े वर्ग में गहरा आक्रोश भर दिया है।
मुख्यमंत्री की इस विभाजनकारी राजनीति ने न केवल अल्पसंख्यकों को लामबंद किया है, बल्कि उन असमिया हिंदुओं को भी नाराज कर दिया है जो शांति चाहते हैं। गौरव गोगोई ने इस राजनीति को बेहद बेशर्म और बेईमान करार देते हुए सरकार को सीधे घेरा है।
विपक्ष के तीखे हमले: अडानी-अंबानी और जेल की चेतावनी
Assam की राजनीति में भ्रष्टाचार और उद्योगपतियों को लाभ पहुंचाने का मुद्दा भी गरमाया हुआ है। गौरव गोगोई ने ऐलान किया है कि अगर कांग्रेस की सरकार आई, तो वह सबसे पहले इस बात की जांच करेंगे कि सरकार ने अडानी और अंबानी को 40 हजार बीघा जमीन कैसे दे दी। वहीं कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी हिमंता को जमकर घेरते हुए उन्हें ‘धोखा देने वाला इंसान’ करार दिया है।
राहुल गांधी ने भी मुख्यमंत्री को कड़ा संदेश देते हुए कहा था कि वह खुद को राजा मानते हैं लेकिन जल्द ही जेल जाएंगे और उन्हें न मोदी बचा पाएंगे और न ही शाह। विपक्ष के इन हमलों ने राज्य में बीजेपी के खिलाफ एक मजबूत माहौल तैयार कर दिया है।
राहुल गांधी का ‘जननायक’ अवतार और गौरव गोगोई का बढ़ता कद
Assam के इस चुनावी समर में राहुल गांधी के दौरों और उनके ‘जननायक’ वाले अवतार ने जनता के साथ एक भावनात्मक जुड़ाव पैदा किया है। जुबिन गर्ग के घर जाकर उनके परिजनों से मिलना और राज्य के गौरव के लिए आवाज उठाना लोगों के दिलों को छू गया है। इसके साथ ही गौरव गोगोई का ‘मैन टू मैन कनेक्ट’ और भ्रष्टाचार के खिलाफ उनकी आक्रामक शैली ने असम की जनता को एक नया विकल्प दे दिया है।
गौरव गोगोई की बढ़ती लोकप्रियता ने Assam में बीजेपी के ग्राफ को तेजी से नीचे गिराया है। सर्वे के ये 30 सीटों वाले आंकड़े बता रहे हैं कि जनता अब बदलाव के मूड में है और 2026 की राह बीजेपी के लिए बेहद कठिन होने वाली है।
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