Kangana Ranaut
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Kangana Ranaut ने एक बार फिर अपनी बयानबाजी से राजनीतिक गलियारों में तूफान खड़ा कर दिया है। पुरानी कहावत ‘सूप बोले तो बोले, छलनी भी बोले जिसमें बहत्तर छेद’ आज भाजपा सांसद और अभिनेत्री कंगना पर बिल्कुल सटीक बैठती है। देश के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को लेकर उन्होंने जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया है, उससे उन्होंने न केवल अपनी मर्यादा लांघी है, बल्कि अपनी गंदी जुबान का एक और सबूत पेश कर दिया है। खुद को एक सम्मानित पद पर देखने वाली कंगना शायद भूल गईं कि वो एक सांसद हैं, लेकिन उनकी भाषा सड़क छाप टपोरियों जैसी हो चली है।
राहुल गांधी को टपोरी कहना और कुंठा का प्रदर्शन
राहुल गांधी को सीधे तौर पर टपोरी कह देना और ये दावा करना कि उनकी हरकतों से महिलाओं को परेशानी होती है, Kangana Ranaut की अपनी कुंठा को दर्शाता है। मोहतरमा, ज़रा देश को ये भी बता दीजिए कि वो कौन सी महिलाएं हैं जिन्हें राहुल गांधी से परेशानी है। या फिर आप भी बीजेपी के उन बाकी पगलैठ नेताओं की कतार में खड़ी हो गई हैं, जिनका काम सिर्फ और सिर्फ अनर्गल प्रलाप करना है।
पुराना इतिहास और ड्रग टेस्ट की बेतुकी मांग
हैरानी की बात ये है कि ये कोई पहली बार नहीं है जब Kangana Ranaut ने राहुल गांधी पर इस तरह का घटिया और पर्सनल अटैक किया हो। अगर इनकी पुरानी हिस्ट्री उठाकर देखें, तो समझ आता है कि इनकी जुबान में जहर भरा हुआ है। जुलाई 2024 का वो वाकया याद करिए, जब इसी कंगना ने बिना किसी सिर-पैर के राहुल गांधी के ड्रग टेस्ट की मांग कर डाली थी। संसद के भीतर एक राष्ट्रीय नेता के चरित्र पर इस तरह का कीचड़ उछालना बताता है कि कंगना को लोकतांत्रिक गरिमा की रत्ती भर भी समझ नहीं है।
निजी रिश्तों पर हमला और ओछी मानसिकता
मुद्दों पर बात करने के बजाय Kangana Ranaut हमेशा निजी रिश्तों पर हमलावर रही हैं। कभी सोनिया गांधी और राहुल गांधी के मां-बेटे के पवित्र रिश्ते को मजबूरी का नाम देना, तो कभी राहुल गांधी को महत्वाकांक्षी मां का मजबूर बेटा कहना, ये इनकी ओछी मानसिकता को ही दिखाता है। राजनीति अपनी जगह है और विरोध अपनी जगह है, लेकिन किसी के परिवार और उसकी परवरिश पर इस तरह की गंदी टिप्पणी करना सिर्फ और सिर्फ संस्कारहीनता की निशानी है।
हिंडनबर्ग मामले पर जहरीला इंसान कहना
हद तो तब हो गई जब हिंडनबर्ग मामले पर सरकार से जवाब मांग रहे राहुल गांधी को इन्होनें सबसे जहरीला और खतरनाक इंसान तक कह डाला। यानी Kangana Ranaut की नज़र में जो सवाल पूछे वो जहरीला, और जो गाली दे, जैसे कि रमेश बिधूड़ी और निशिकांत दुबे जैसे नेता, वे दूध के धुले हैं। वाह कंगना जी, आपने तो निष्पक्षता की सारी परिभाषाएं ही बदल दीं।
तर्कों की शक्ति और भाषा की शालीनता का अभाव
जी हां दोस्तों, Kangana Ranaut ने सारी हदें ही पार कर दी हैं। राहुल गांधी को दिमागी संतुलन खो चुका व्यक्ति बताना और उन्हें सरेआम टपोरी कहना ये साबित करता है कि कंगना के पास न तो तर्कों की शक्ति बची है और न ही भाषा की शालीनता। प्रियंका गांधी को तमीज सिखाने की नसीहत देने वाली कंगना खुद अपनी मर्यादा भूल चुकी हैं।
मतदाताओं की शर्मिंदगी और अनियंत्रित जुबान
वो कहती हैं कि राहुल गांधी की हरकतों से औरतों को शर्मिंदगी होती है, पर असल में शर्मिंदगी तो उन मतदाताओं को हो रही होगी जिन्होंने Kangana Ranaut जैसी महिला को चुनकर संसद भेजा, जिसकी जुबान पर लगाम ही नहीं है। क्या एक सांसद को ये शोभा देता है कि वो बिना किसी सबूत के देश के नेता प्रतिपक्ष पर नशेड़ी होने का लेबल लगा दे, या फिर ये सब सिर्फ हेडलाइंस में बने रहने का एक सस्ता जरिया है।
संवैधानिक पद का अपमान और रील लाइफ का भ्रम
क्या Kangana Ranaut को ये अहसास है कि नेता प्रतिपक्ष का पद एक संवैधानिक पद होता है? उस पद पर बैठे व्यक्ति को टपोरी कहना देश के लोकतंत्र का अपमान है। लेकिन शायद मोहतरमा को लगता है कि वो आज भी किसी फिल्म के सेट पर बैठी हैं जहाँ वो कोई भी डायलॉग मारेंगी और लोग तालियाँ बजाएंगे। ये रील लाइफ नहीं है कंगना जी, ये रियल लाइफ पॉलिटिक्स है।
जनता की अदालत और बयानों का हिसाब
राजनीति में आपकी एक-एक बात का हिसाब जनता रखती है। Kangana Ranaut को यह समझना होगा कि संसद की सदस्यता जिम्मेदारी का काम है, न कि विवादों के जरिए चर्चा में रहने का मंच। उनके द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा उनके राजनीतिक भविष्य पर भी सवालिया निशान लगाती है।
राहुल गांधी को नसीहत और खुद का व्यवहार
राहुल गांधी को तमीज सिखाने वाली Kangana Ranaut को पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिए। दूसरों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने से पहले उन्हें खुद विधायी मर्यादाओं का पालन करना सीखना होगा। संसद की गरिमा चिल्लाने और अपशब्द बोलने से नहीं, बल्कि तर्कपूर्ण बहस से बढ़ती है।
क्या राजनीति में मर्यादा का अंत हो गया है?
अंत में सवाल यह उठता है कि क्या Kangana Ranaut जैसी टिप्पणियों के बाद भारतीय राजनीति में शालीनता के लिए कोई जगह बचेगी? नेता प्रतिपक्ष पर इस तरह के व्यक्तिगत और निचले स्तर के हमले यह दर्शाते हैं कि तर्कों की कमी होने पर किस तरह अपशब्दों का सहारा लिया जाता है।
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