Manmohan Singh
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Manmohan Singh ने सालों पहले जो अंदेशा जताया था, आज देश के हालात उसे सच साबित करते दिख रहे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री Manmohan Singh की वह खामोशी आज वर्तमान परिस्थितियों में चीख-चीख कर गवाही दे रही है। उन्होंने आगाह किया था कि संस्थागत स्वायत्तता खत्म होगी और अर्थव्यवस्था के लिए बिना सोचे-समझे लिए गए फैसले विनाशकारी साबित होंगे। आज गैस सिलेंडर के लिए लगती लंबी कतारें और छिनती नौकरियां उसी का जीता-जागता प्रमाण हैं।
गैस संकट: कतारों का गुलाम बनता आम आदमी
देश में आज फिर से ‘कतार संस्कृति’ लौट आई है। बिहार के कटिहार से लेकर उत्तर प्रदेश के शहरों तक, गैस सिलेंडर के लिए मारामारी मची है। Manmohan Singh का वह कथन आज भी प्रासंगिक है कि “मजबूत प्रधानमंत्री वह नहीं जो कैमरे के सामने दहाड़े, बल्कि वह है जो जनता का पेट भरे।” आज हालात यह हैं कि यदि अगले 10 दिनों में गैस सप्लाई सामान्य नहीं हुई, तो हॉस्टलों के मेस, छोटे होटल और ढाबे ठप पड़ जाएंगे। हज़ारों छात्र और मज़दूर भूखे रहने को मजबूर हो जाएंगे।
महंगाई का ‘डबल डोज़’ और ध्वस्त सप्लाई चेन
जनता आज महंगाई की दोहरी मार झेल रही है। LPG के दामों में बढ़ोतरी के साथ-साथ अब सरसों तेल और रिफाइंड तेल के दाम भी 30 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ गए हैं। व्यापारियों का कहना है कि सप्लाई चेन पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है और मार्केट में माल की भारी कमी है। Manmohan Singh के दौर की आर्थिक स्थिरता के मुकाबले आज डॉलर के सामने रुपया लगातार कमजोर होकर अपनी साख खो रहा है।
विदेश नीति और मिडिल ईस्ट क्राइसिस
Manmohan Singh ने विदेश नीति के खोखले होने का जो डर जताया था, वह ईरान-इजरायल युद्ध के बीच साफ़ दिख रहा है। क्रूड ऑयल और गैस की किल्लत बढ़ रही है, लेकिन सरकार का फोकस बुनियादी समस्याओं के बजाय नाम बदलने की राजनीति पर अधिक दिखता है। जनता पूछ रही है कि जब रसोई में सिलेंडर नहीं है और जेब खाली है, तो क्या राज्यों के नाम बदलने से पेट भरेगा?
‘इवेंट मैनेजमेंट’ बनाम जमीनी हकीकत
पिछले 11 सालों के कार्यकाल पर नजर डालें तो Manmohan Singh की चेतावनियां एक-एक कर सही साबित होती दिख रही हैं। पहले नोटबंदी की कतार, फिर ऑक्सीजन की कतार और अब सिलेंडर की कतार ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। आरोप है कि रूस से सस्ता तेल लेने के बजाय अमेरिका के दबाव में लिए गए फैसलों ने भारत को ‘कॉम्प्रोमाइज्ड’ स्थिति में खड़ा कर दिया है।
क्या वाकई मोदी सरकार, देश के लिए एक ऐतिहासिक भूल है?
अर्थशास्त्री Manmohan Singh ने जिस मंदी और बर्बादी की ओर इशारा किया था, आज गरीब और मध्यम वर्ग उसे अपनी थाली में महसूस कर रहा है। घरेलू सिलेंडर पर 60 रुपये और कमर्शियल पर 115 रुपये की बढ़ोतरी ने जनता को सड़क पर ला दिया है। Manmohan Singh के नजरिए से देखें तो वर्तमान सरकार का ‘PR ड्रामा’ ज़मीनी हकीकत को छुपाने में नाकाम रहा है।
Manmohan Singh के समर्थकों और आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि देश अब और कतारें नहीं झेल सकता। अंततः जनता आज उस नेतृत्व को याद कर रही है जो कम बोलता था लेकिन जिसकी नीतियों में स्थिरता थी। Manmohan Singh का नाम आज उस आर्थिक दूरदर्शिता का प्रतीक बन गया है जिसकी कमी वर्तमान दौर में साफ़ खल रही है।
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