Mohan Bhagwat

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Mohan Bhagwat का दावा है कि दुनिया में चल रहे युद्धों को सिर्फ और सिर्फ भारत ही रुकवा सकता है। भागवत जी, अगर मोदी सरकार की कूटनीति में इतनी ही ताकत है तो फिर ये युद्ध रुक क्यों नहीं रहा? स्ट्रैट ऑफ हॉर्मूज में फंसे बाकी के 22 जहाज भारत कब आएंगे, पहले इसका जवाब दीजिए। क्या डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहू ने ‘विश्वगुरु’ का फोन उठाना बंद कर दिया है? या फिर हकीकत कुछ और ही है जिसे आप देश की जनता से छिपाना चाहते हैं।

शांति का पाठ और खाली चूल्हा

सच्चाई तो ये है कि दुनिया को शांति का पाठ पढ़ाने वाले देश के अपने लोग आज रसोई गैस के लिए लंबी-लंबी लाइनों में खड़े हैं। Mohan Bhagwat जी, यूक्रेन और इजरायल की चिंता छोड़िए, पहले उन चूल्हों की फिक्र कीजिए जो महंगाई की मार से ठंडे पड़ चुके हैं। जब देश का मध्यम वर्ग एक अदद सिलेंडर और पेट्रोल के दाम से त्रस्त है, तब आपकी ये ‘युद्ध खत्म कराने’ वाली थ्योरी सिर्फ और सिर्फ जनता का ध्यान भटकाने का जरिया लगती है।

फेल होती कूटनीति

हकीकत ये है कि मोदी सरकार के दौर में भारत की कूटनीति पूरी तरह फेल साबित हो रही है। Mohan Bhagwat को यह समझना होगा कि भारत आज दुनिया भर में अलग-थलग पड़ता जा रहा है। पड़ोसियों से रिश्ते खराब हैं और वैश्विक मंच पर भारत की बात का वजन घटता जा रहा है। लेकिन इसके बावजूद आप कह रहे हैं कि भारत ही दुनिया को बचा सकता है। साहब, इन हवा-हवाई दावों से जनता का पेट नहीं भरता।

लाइनों में खड़ा हिंदुस्तान

देश की जनता आज लाइनों में लगी है; किसी को गैस चाहिए तो किसी को रोजगार। जो सरकार अपने नागरिकों को सस्ते दाम पर और सही समय पर रसोई गैस मुहैया नहीं करा पा रही है, वो दुनिया का युद्ध रुकवाने की बात करती है तो हंसी आती है। Mohan Bhagwat मोदी सरकार को घेरने के बजाय उन्हें ‘विश्वगुरु’ की काल्पनिक इमेज देने में जुटे हैं, जबकि धरातल पर आम आदमी महंगाई के बोझ तले दबा जा रहा है।

चुनावी जुमलेबाजी का खेल

Mohan Bhagwat जी, क्या भारत की मोदी सरकार की बात वाकई कोई सुन रहा है या ये सब सिर्फ होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए बुनी गई एक और जुमलेबाजी है? जनता को अंतरराष्ट्रीय शांति दूत की इमेज नहीं, बल्कि सस्ता सिलेंडर और हाथ में काम चाहिए। जिस दिन देश की जनता इन अंतहीन लाइनों से मुक्त हो जाएगी, उस दिन दुनिया को बचाने की बात कीजिएगा।

ये जो ‘विश्वगुरु’ का चश्मा Mohan Bhagwat आपने पहन रखा है, उसे उतारकर एक बार उन लाइनों में खड़े लोगों का दर्द देखिए। वे लोग जो घंटों इंतजार के बाद भी खाली हाथ घर लौट रहे हैं, उनकी बेबसी का जवाब किसके पास है? सत्ता के संरक्षण में बैठकर बड़े-बड़े दावे करना बहुत आसान है, लेकिन सड़क पर संघर्ष कर रहे उस आदमी से पूछिए जिसके लिए आज दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी ‘युद्ध’ लड़ने जैसा हो गया है।

बदहाली सुधारिए, ठेका मत लीजिए

मोदी सरकार और Mohan Bhagwat जी, ये जान लीजिए कि जनता अब खोखले नारों से ऊब चुकी है। अगर वाकई आप में ताकत है तो पहले देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाइए। पहले गैस की किल्लत दूर कीजिए। दुनिया का ठेका लेने से पहले अपने घर की बदहाली को सुधारिए। Mohan Bhagwat को यह याद रखना चाहिए कि इतिहास गवाह है कि भूखी जनता को ‘विश्वगुरु’ के सपने दिखाकर ज्यादा दिनों तक बहलाया नहीं जा सकता।

जब Mohan Bhagwat अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के प्रभाव की बात करते हैं, तो आम आदमी अपनी खाली जेब देखता है। क्या वैश्विक शांति की बात करना घरेलू संकटों से मुंह मोड़ने का तरीका है? Mohan Bhagwat के बयानों में वह गंभीरता नहीं दिखती जो आज के आर्थिक संकट के समय में होनी चाहिए।

Mohan Bhagwat जिस शक्ति की बात कर रहे हैं, वह जमीन पर कहीं नजर नहीं आती। कूटनीतिक मोर्चे पर विफलता के कारण ही आज हमारे जहाज विदेशों में फंसे हैं और हम सिर्फ तमाशबीन बने हुए हैं। Mohan Bhagwat का यह दावा कि भारत ही रक्षक है, वर्तमान परिस्थितियों में किसी मजाक से कम नहीं लगता।


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