Nitin Nabin

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Nitin Nabin को बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में चुने जाने के बाद अब ढिंढोरा पीटा जा रहा है कि बीजेपी के अंदर तो परिवारवाद है ही नहीं। बीजेपी के नेता टाइप के लोगों को लग रहा है कि नितिन नबीन को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर बहुत बड़ी मिसाल कायम कर दी गई है। उनका दावा है कि यह ‘कार्यकर्ताओं की पार्टी’ है और यहाँ अध्यक्ष लोकतांत्रिक तरीके से ‘निर्वाचित’ होता है, लेकिन इस सफेद झूठ की हकीकत क्या है?

अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हुए या फिर झूठ बोला गया?

Nitin Nabin को राष्ट्रीय अध्यक्ष किस तौर पर चुना गया, क्या बीजेपी इसके बारे में बताएगी? बताएगी कि नितिन के खिलाफ कितने उम्मीदवार मैदान में थे, कितने वोटों के अंतर से वो जीते? जवाब है—एक भी नहीं। क्योंकि ना तो कोई चुनाव हुआ और ना ही कोई दूसरा प्रत्याशी खड़ा होने की हिम्मत कर पाया। मोदी-शाह की जोड़ी ने बंद कमरे में नाम तय किया और पूरी पार्टी पर उसे थोप दिया। यह लोकतंत्र नहीं बल्कि गुजरात से चलने वाला एक ‘कॉरपोरेट ऑफिस’ है जहाँ सिर्फ आज्ञाकारी चेहरों की ही जगह है।

परिवारवाद का क्या चक्कर है?

अब बात करते हैं उस ‘परिवारवाद’ की जिसका नाम सुनते ही बीजेपी वाले दूसरी पार्टियों पर कीचड़ उछालने लगते हैं। क्योंकि दोस्तों, Nitin Nabin सिन्हा कोई जमीन से संघर्ष करके आए कार्यकर्ता नहीं हैं। उनके नाम में ही परिवारवाद की गहरी छाप है। नितिन इनका नाम और इनके पिता नवीन किशोर सिन्हा, जो पटना पश्चिम से 4 बार विधायक रहे, उन्हीं की विरासत की थाली में परोसकर नितिन नबीन को राजनीति गिफ्ट में दी गई। जो खुद बांकीपुर सीट से 4 बार के विधायक रहे और वर्तमान में नीतीश कुमार की सरकार में ‘सड़क निर्माण मंत्री’ का पद संभाल रहे हैं।

इसे कहते हैं असली परिवारवाद। मोदी-शाह ने एक ऐसे व्यक्ति को अध्यक्ष चुना है जो उनके फैसलों पर कभी सवाल न उठा सके। उन्हें संगठन का कोई दिग्गज नेता नहीं बल्कि एक ऐसी ‘कठपुतली’ चाहिए थी जिसके धागे उनके हाथ में रहें।

Nitin Nabin को उनकी किस योग्यता के लिए चुना गया?

Nitin Nabin की योग्यता क्या है? क्या उनके पास राष्ट्रीय स्तर पर नीति बनाने या संगठन चलाने का कोई बड़ा अनुभव है? बिल्कुल नहीं। जिस पद पर कभी अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गज बैठते थे, आज उस पद पर ऐसे व्यक्ति को बिठा दिया गया है जिसकी पहचान सिर्फ उसके पिता का नाम और ‘जी हुज़ूरी’ करना है। Nitin Nabin का कद अध्यक्ष पद के लायक तो कहीं से नहीं लगता, लेकिन मोदी-शाह को ऐसा ही चेहरा चाहिए था ताकि ऊपर से मिलने वाले आदेशों पर कोई चूँ तक न कर सके।

हैरानी की बात देखिए, बीजेपी को लगता है कि जनता मूर्ख है। नया लिफाफा है लेकिन चिट्ठी वही पुरानी है। चेहरा नया है लेकिन सोच वही—सिर्फ अपने खास समीकरणों को साधने की राजनीति। जब बात बड़े पदों की आती है तो बीजेपी को कोई पिछड़ा या दलित कार्यकर्ता याद नहीं आता। वे केवल चुनाव के समय इन वर्गों का नाम जपते हैं लेकिन जब कमान देने की बात आती है तो अपने खास ‘वफादारों’ को ही चुनते हैं।

Nitin Nabin का ट्रैक रिकॉर्ड रहा है बेहद खराब

नितिन नबीन के ट्रैक रिकॉर्ड को देखिये। वह बिहार से आते हैं जहाँ बीजेपी सालों से बैसाखियों के सहारे चल रही है। जो नेता अपने राज्य में बीजेपी को अपने दम पर खड़ा नहीं कर पाया, वो राष्ट्रीय स्तर पर क्या करिश्मा करेगा? छत्तीसगढ़ के प्रभारी रहते हुए उनके कार्यकाल में हसदेव के जंगलों को काटा गया और आदिवासियों पर लाठियां चलीं। बिहार में जब युवा रेलवे भर्ती और अग्निपथ योजना के खिलाफ सड़कों पर लाठियां खा रहे थे, तब Nitin Nabin मंत्री पद का आनंद ले रहे थे।

उन्होंने कभी युवाओं के हक में आवाज नहीं उठाई। ऐसे युवा-विरोधी चेहरे को अध्यक्ष बनाकर बीजेपी ने देश के नौजवानों के जख्मों पर नमक छिड़का है। सच तो यह है कि बीजेपी में परिवारवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं।

परिवारवाद के चक्कर में ये BJP नेता भी हुए बदनाम

ज्योतिरादित्य सिंधिया, पीयूष गोयल, धर्मेंद्र प्रधान, अनुराग ठाकुर, जय शाह—ये लंबी लिस्ट है जिसे बीजेपी छिपाना चाहती है। लेकिन Nitin Nabin को अध्यक्ष बनाकर बीजेपी ने खुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली है। जनता अब आपकी ‘वंशवाद विरोधी’ होने की नौटंकी को पूरी तरह समझ चुकी है। जो लोग परिवारवाद को ही संगठन का आधार बना चुके हैं, उनका दोहरा चेहरा अब पूरी दुनिया के सामने बेनकाब हो चुका है।


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