PM Modi

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PM Modi ने केरल के थिरुवल्ला में आयोजित एनडीए की रैली में जनता के वास्तविक मुद्दों पर बात करने के बजाय बॉलीवुड फिल्मों का महिमामंडन शुरू कर दिया है। जहाँ एक प्रधानमंत्री को देश की भूख, बेरोजगारी और गिरती अर्थव्यवस्था जैसे गंभीर विषयों पर अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करना चाहिए था, वहां PM Modi किसी पीआर एजेंसी के हेड की तरह व्यवहार करते नजर आए।

रैली में धुरंधर, द कश्मीर फाइल्स और द केरला स्टोरी जैसी फिल्मों का बचाव करना यह दर्शाता है कि भाजपा के पास अब अपनी उपलब्धियां गिनाने के लिए कुछ ठोस बचा नहीं है। इसीलिए अब जनता का ध्यान भटकाने के लिए इन कथित प्रोपेगैंडा फिल्मों का सहारा लिया जा रहा है ताकि सरकार अपनी विफलताओं को सिनेमा के पर्दे के पीछे छिपा सके।

प्रधानमंत्री की भूमिका पर उठते सवाल

एक लोकतांत्रिक देश के मुखिया का दायित्व होता है कि वह जनता को पिछले 10 वर्षों का हिसाब दे और बताए कि कितने युवाओं को रोजगार मिला या महंगाई पर लगाम क्यों नहीं लगी। लेकिन PM Modi इन बुनियादी सवालों से बचने के लिए फिल्मों को अपनी ढाल बना रहे हैं, जो सीधे तौर पर उनकी जवाबदेही से भागने की कोशिश है। जब विपक्ष इन फिल्मों की सत्यता पर सवाल उठाता है, तो PM Modi उन्हें गलत ठहराने में पूरी ताकत झोंक देते हैं।

यह व्यवहार किसी देश के प्रधानमंत्री का नहीं बल्कि किसी फिल्म प्रोडक्शन हाउस के ब्रांड एंबेसडर जैसा प्रतीत होता है, जो पूरी तरह से एक सोची-समझी राजनीति का हिस्सा है।

फिल्मों के जरिए नाकामियों का बचाव

अगर गहराई से विश्लेषण किया जाए तो समझ आता है कि इन फिल्मों का निर्माण केवल मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि PM Modi सरकार के विवादित फैसलों को सही ठहराने के लिए किया गया है। विशेषकर ‘धुरंधर’ जैसी फिल्मों के माध्यम से नोटबंदी जैसे भयावह और आत्मघाती फैसलों का बचाव करने का प्रयास किया जा रहा है, जिसने देश की आर्थिक रीढ़ तोड़ दी थी। PM Modi को शायद यह लगता है कि फिल्मी कहानियों के जरिए उन लाखों व्यापारियों और आम नागरिकों के जख्मों पर मरहम लगाया जा सकता है, जिन्होंने नोटबंदी के दौरान अपनी मेहनत की कमाई और अपनों को खो दिया था।

नफरत की राजनीति का नया रूप

सच्चाई यह है कि देश की जनता अब भाजपा की पारंपरिक हिंदू-मुस्लिम वाली विभाजनकारी राजनीति को समझ चुकी है और नफरत का बाजार अब पहले जैसा नहीं चल रहा है। इसीलिए PM Modi ने अब सिनेमा को एक नए हथियार के रूप में चुना है ताकि समाज में ध्रुवीकरण का नया तरीका निकाला जा सके।

द कश्मीर फाइल्स और द केरला स्टोरी जैसी फिल्मों को सरकारी संरक्षण देना और उन्हें टैक्स फ्री करना यह साफ करता है कि चुनाव जीतने के लिए अब पर्दे का सहारा लिया जा रहा है। PM Modi द्वारा इन फिल्मों का प्रचार करना लोकतंत्र के लिए एक चिंताजनक संकेत है।

केरल की साक्षरता बनाम प्रोपेगैंडा

केरल जैसे जागरूक और साक्षर राज्य में जाकर ऐसी विवादित फिल्मों की चर्चा करना यह बताता है कि दक्षिण भारत में पैर जमाने के लिए PM Modi कितनी छटपटाहट में हैं। केरल की जनता जानती है कि असली मुद्दे अस्पताल, स्कूल और नौकरियां हैं, न कि किसी फिल्म की समीक्षा करना जो केवल एक खास एजेंडे को बढ़ावा देती हो।

PM Modi को यह समझना होगा कि जागरूक मतदाता स्क्रीन पर दिखाए जा रहे प्रोपेगैंडा और सड़क की वास्तविक स्थिति के बीच के अंतर को बखूबी पहचानते हैं और वे केवल फिल्मी संवादों के आधार पर अपना भविष्य तय नहीं करेंगे।

सिनेमा से नहीं मिलेगी चुनावी वैतरणी

अंत में यह स्पष्ट है कि प्रोपेगैंडा फिल्में किसी भी सरकार की डूबती नैया को पार नहीं लगा सकतीं क्योंकि भूख और गरीबी का इलाज फिल्मी दृश्यों में नहीं है। PM Modi अगर यह सोचते हैं कि बॉलीवुड के जरिए वे अपनी प्रशासनिक नाकामियों पर हमेशा के लिए पर्दा डाल देंगे, तो यह उनकी बड़ी गलतफहमी है।

जनता अब जाग चुकी है और वह विकास का असली पैमाना मांग रही है, जो कि केवल दावों और फिल्मों में नहीं बल्कि धरातल पर नजर आना चाहिए। PM Modi के इस फिल्मी प्रेम का जवाब देश की जनता आने वाले समय में अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के जरिए जरूर देगी।


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