Rekha Gupta
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Rekha Gupta के प्रशासन और दिल्ली की बदहाल सड़कों ने एक और मासूम जिंदगी को लील लिया है। दिल्ली के रोहिणी सेक्टर 32 से आई तस्वीरें और एक बेबस मां की चीखें किसी का भी कलेजा चीरने के लिए काफी हैं। बिहार के समस्तीपुर से अपना और अपने परिवार का पेट पालने दिल्ली आया बिरजू क्या जानता था कि देश की राजधानी की सड़कें उसके लिए कब्रगाह बन जाएंगी। महाशक्ति काली मंदिर के पास एक खुला मैनहोल साक्षात यमराज बनकर बैठा था, जिसमें गिरकर बिरजू की मौत हो गई।
बदहवास मां का बुरा हाल और प्रशासन की चुप्पी
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में वह मां जमीन पर गिर-गिर कर दहाड़ें मार रही है। अपने जिगर के टुकड़े का नाम ले-लेकर वह बेसुध हुई जा रही है और बार-बार पूछ रही है कि ‘मेरा बिरजू अब कभी वापस नहीं आएगा’। Rekha Gupta और उनके प्रशासन के पास इस बेबस मां के लिए कोई जवाब नहीं है। वह मां जो समस्तीपुर में बैठकर हर महीने अपने बेटे की चिट्ठी और पैसों का इंतजार करती थी ताकि घर का चूल्हा जल सके, आज उसके पास सिर्फ जवान बेटे की मौत की खबर पहुंची है।
सत्ता के शोर में दबी गरीब की आवाज
हैरानी की बात यह है कि इतनी बड़ी घटना के बावजूद Rekha Gupta की ओर से कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई गई है। आरोप है कि उनका सोशल मीडिया अकाउंट ‘भजन क्लबिंग’ जैसे आयोजनों के प्रचार से भरा है, लेकिन इस ‘डेथ ट्रैप’ पर उन्होंने चुप्पी साध रखी है। क्या सत्ता की कुर्सी के शोर में एक गरीब की जान की कीमत शून्य हो गई है? Rekha Gupta ने न तो जनकपुरी में मारे गए कमल के परिवार के प्रति संवेदना जताई और न ही बिरजू की मौत पर कोई ठोस कदम उठाया।
दिल्ली-एनसीआर बना ‘डेथ ट्रैप’
दिल्ली और एनसीआर के इलाके अब रहने लायक नहीं बल्कि मौत के जाल बन चुके हैं। आंकड़ों के अनुसार, जनवरी 2024 से दिसंबर 2025 के बीच 239 से ज्यादा लोग इन खुले नालों और गड्ढों की भेंट चढ़ गए हैं। Rekha Gupta के कार्यकाल में सड़कों की यह स्थिति ‘सरकारी हत्याओं’ की ओर इशारा करती है। विकास के बड़े-बड़े वादे अब खोखले नजर आ रहे हैं क्योंकि जमीनी हकीकत में सड़कें अब श्मशान का रास्ता बन चुकी हैं।
जवाबदेही से भागता सिस्टम
पहले अगर पिछली सरकारों पर दिल्ली को नर्क बनाने के आरोप लगे, तो Rekha Gupta के प्रशासन ने पूरी दिल्ली को गड्ढों में तब्दील कर दिया है। प्रशासन को अच्छी तरह पता है कि मैनहोल खुले हैं, फिर भी उन्हें ढका नहीं जा रहा है। Rekha Gupta को यह जवाब देना होगा कि उस मां के भरोसे का कत्ल क्यों किया गया। यह महज एक हादसा नहीं, बल्कि सिस्टम की क्रूरता और उन गरीबों के साथ गद्दारी है जो इस शहर को अपने खून-पसीने से सींचते हैं।
राजनीति की रोटियां और बेबस जनता
Rekha Gupta चुनाव के समय तो बड़े-बड़े वादे करती थीं, लेकिन आज जब एक मजदूर की जान चली गई, तो वह गायब हैं। क्या समस्तीपुर के उस मजदूर की जान की कोई कीमत नहीं है क्योंकि वह कोई रसूखदार व्यक्ति नहीं था? Rekha Gupta को समझना होगा कि यह मौत नहीं, एक परिवार की उम्मीदों की हत्या है।
दिल्ली की सड़कों पर चलते इंसान अब खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। Rekha Gupta और संबंधित अधिकारियों को इस लापरवाही की जिम्मेदारी लेनी होगी। जनता पूछ रही है कि क्या अधिकारियों को किसी और बड़े हादसे का इंतजार है? Rekha Gupta को अब अपनी ‘बकैती’ छोड़कर धरातल पर काम करना होगा, वरना इतिहास उन्हें एक संवेदनहीन प्रशासक के रूप में याद रखेगा।
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