Teleprompter

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Teleprompter के सहारे वैश्विक नेता बनने का दावा करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी क्या विदेशी धरती पर अपनी ही पहचान और देश की परिभाषा भूल जाते हैं? यह सवाल आज सोशल मीडिया पर फिर से गूँज रहा है। इजरायल की यात्रा के दौरान मोदी जी ने एक ऐसा बयान दिया जिसे सुनकर किसी का भी सिर चकरा सकता है। साहिब ने कहा, “Israel is Fatherland… India is Motherland.” अब सवाल यह उठता है कि क्या उनके Teleprompter पर यही लिखा था?

भारत जिसे हम बचपन से पितृभूमि और मातृभूमि दोनों मानते आए हैं, उसे मोदी जी ने विदेशी मंच पर सिर्फ ‘मदरलैंड’ तक सीमित कर दिया और इजरायल को ‘फादरलैंड’ बना दिया। क्या यह स्क्रिप्ट लिखने वालों की गलती थी या फिर साहिब ने स्क्रीन पर जो दिखा, वही बिना सोचे-समझे पढ़ दिया?

मौलिक सोच का अभाव और विदेशी भाषा की चुनौती

हकीकत तो यह है कि अब साहिब के पास अपनी कोई मौलिक सोच नहीं बची है। उनके सामने Teleprompter पर जो शब्द डाल दिए जाते हैं, वे उसे ही अंतिम सत्य मानकर पढ़ देते हैं। इसका देश की अस्मिता पर क्या असर होगा, शायद उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। अंग्रेजी भाषा के साथ उनका संघर्ष भी जगजाहिर है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैंक्रो के साथ उनका वह वीडियो याद कीजिए, जो जमकर वायरल हुआ था। मैंक्रो बड़ी शालीनता से पूछ रहे थे कि वे कब आए, लेकिन मोदी जी Teleprompter के अभाव में अपनी ही धुन में कुछ का कुछ जवाब दे रहे थे।

ट्रंप के सामने खामोशी और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फजीहत

साल 2025 में ट्रंप के सामने भी उनकी स्थिति कुछ वैसी ही थी। विदेशी पत्रकार सवाल पूछ रहे थे और साहिब बिना Teleprompter के बगले झांक रहे थे। हालत यह हो गई थी कि ट्रंप को खुद कहना पड़ा, “चलिए, इनका सवाल भी मैं ही ले लेता हूँ।” एक सवा सौ करोड़ की आबादी वाले देश के प्रतिनिधि का अंतरराष्ट्रीय मंच पर इस तरह खामोश रहना वाकई शर्मिंदगी भरा था। बिना Teleprompter के उनकी घिग्घी बंध जाना अब कोई नई बात नहीं रह गई है।

दावोस की वो ऐतिहासिक ‘घिस्स्स-फिस्स्स’

साल 2022 की दावोस वाली घटना कौन भूल सकता है? मोदी जी पूरे रौब में भाषण दे रहे थे कि तभी अचानक Teleprompter बंद हो गया। स्क्रीन बंद होते ही ‘विश्वगुरु’ की बोलती भी बंद हो गई। वे हड़बड़ाकर इधर-उधर देखने लगे और आयोजकों से पूछने लगे कि आवाज आ रही है या नहीं। असल में आवाज तो आ रही थी, बस उनके सामने लगा Teleprompter धोखा दे गया था। यह साबित करता है कि बिना बिजली और स्क्रीन के वे दो मिनट भी नहीं बोल सकते।

रीडर या लीडर: दिल्ली की रैली में फिर खुली पोल

यही हाल हाल ही में दिल्ली की एक रैली में भी देखने को मिला, जहाँ भाषण के बीच में Teleprompter ने साथ छोड़ दिया और साहिब फिर अटक गए। खुद को महान वक्ता बताने वाले नेता की असलियत यह है कि वे महज एक ‘रीडर’ बनकर रह गए हैं। इजरायल को ‘फादरलैंड’ बोलना कोई मामूली जुमला नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि Teleprompter पर जो थमा दिया जाता है, साहिब उसे ही बांच देते हैं। आज का कड़वा सच यही है कि उनका पूरा व्यक्तित्व और उनकी वाकपटुता सिर्फ एक Teleprompter की मोहताज होकर रह गई है।


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