Modi Government

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Modi Government के राज में देश का बैंकिंग सिस्टम अब आम जनता की जेब काटने और बड़े कॉरपोरेट दोस्तों की तिजोरियां भरने का अड्डा बन चुका है। 100 रुपये का कर्ज लो, 30 पैसे वापस करो और पूरा का पूरा कर्ज माफ। क्या ऐसा कोई बैंक आम नागरिक के लिए काम करता है? नहीं, यह खास स्कीम सिर्फ और सिर्फ Modi Government के चहेते उद्योगपतियों के लिए है। देश का इंसॉल्वेंसी ट्रिब्यूनल यानी NCLT अब बड़े बकायेदारों को क्लीन चिट देने वाली मशीन बन चुका है और Modi Government के दौर में पूरी व्यवस्था तमाशा देख रही है।

ज़ी समूह का 22,000 करोड़ का लोन और 99.97% की छूट

मामला ज़ी ग्रुप के पूर्व चेयरमैन सुभाष चंद्रा से जुड़ा है, जिन पर 22,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का भारी-भरकम कर्ज था। लेकिन ट्रिब्यूनल के एक फैसले से इस पूरे कर्ज को खत्म कर दिया गया और बदले में उनसे वसूले गए महज 6.5 करोड़ रुपये। हिसाब लगाएंगे तो दिमाग सन्न रह जाएगा, क्योंकि यह कुल कर्ज का लगभग 99.97 प्रतिशत हिस्सा साफ कर देने जैसा है। यानी जनता का 21,999 करोड़ रुपये पानी में बहा दिया गया। इसे वित्तीय भाषा में ‘हेयरकट’ कहा जाता है।

लेकिन इस फैसले पर तंज कसते हुए कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने बिल्कुल सही कहा कि यह कोई ‘हेयरकट’ नहीं, बल्कि देश के सार्वजनिक बैंकों और जनता के पैसों का सरेआम ‘मुंडन’ है। Modi Government के इस दौर में बैंकिंग व्यवस्था पर यह एक गंभीर प्रहार है।

आईबीसी कानून की सच्चाई

साल 2016 में Modi Government आईबीसी कानून लेकर आई थी। उस समय बड़ा दावा किया गया था कि इससे बैंकों का फंसा पैसा तेजी से वापस आएगा। लेकिन आज यह कानून बड़े डिफाल्टरों के लिए लोन माफी का लाइसेंस बन चुका है। सवाल उठना लाजमी है कि जब 22 हजार करोड़ का लोन सिर्फ साढ़े छः करोड़ में सेटल हो जाता है, तो बाकी के 22 हजार करोड़ रुपये के नुकसान की भरपाई कौन करता है? Modi Government के इस मॉडल से सीधे तौर पर सरकारी खजाने को चोट पहुँच रही है।

आम करदाता भर रहा है कॉरपोरेट घाटे की भरपाई

इस नुकसान का सीधा जवाब है देश का आम करदाता और बैंकों में अपनी गाढ़ी कमाई जमा करने वाला मध्यम वर्ग। जब बड़े उद्योगपतियों को बिना किसी कड़े नियम के हजारों करोड़ के लोन बांटे जाते हैं और बाद में इंसॉल्वेंसी के नाम पर कौड़ियों के भाव राहत दे दी जाती है, तो बैंक घाटे में जाते हैं। इस घाटे की भरपाई आम जनता की जेब पर टैक्स बढ़ाकर की जाती है। Modi Government की नीतियों के चलते आम नागरिकों पर आर्थिक बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।

आम नागरिक पर सख्ती और कॉरपोरेट्स को राहत

दूसरी तरफ अगर कोई आम इंसान अपने होम लोन या बाइक लोन की किश्त चुकाने में थोड़ी भी देरी कर दे, तो बैंक उसके पीछे रिकवरी एजेंट भेज देते हैं। उसका सिबिल स्कोर बर्बाद कर दिया जाता है और कानूनी नोटिस थमा दिए जाते हैं। आम आदमी के लिए 50 पैसे की देनदारी भी ‘पाप’ बन जाती है और बड़े कॉरपोरेट के लिए हजारों करोड़ डकार जाना सिर्फ एक ‘बिजनेस डील’ बन जाता है। Modi Government के शासन में बैंकिंग तंत्र का यह दोहरा रवैया साफ़ नजर आता है।

16 लाख करोड़ का राइट-ऑफ और भविष्य के सवाल

यह पहली बार नहीं हुआ है, Modi Government के कार्यकाल में कॉरपोरेट लोन माफी का यह खेल लगातार जारी है। दावों के मुताबिक बड़े-बड़े कॉरपोरेट्स के लगभग 16 लाख करोड़ रुपये के लोन राइट ऑफ किए जा चुके हैं। अनिल अंबानी की कंपनी का ही उदाहरण लीजिए, जहां 49 हजार करोड़ रुपये के भारी कर्ज का सेटलमेंट पूरे लोन का महज एक परसेंट वसूल कर कर लिया गया और बाकी का 99 परसेंट जनता के सिर पर मढ़ दिया गया।

Modi Government के इस आर्थिक युग में आखिर देश के बैंकिंग सिस्टम को किस दिशा में ले जाया जा रहा है, यह Modi Government से पूछा जाने वाला सबसे बड़ा सवाल है।


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