Nitin Gadkari
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Nitin Gadkari भारतीय जनता पार्टी का वह चेहरा हैं, जो अपनी बेबाकी और काम करने के अंदाज के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में दिल्ली के सियासी गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि क्या नितिन गडकरी कोई बहुत बड़ा कदम उठाने वाले हैं। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के साथ उनकी हुई लंबी मुलाकात ने राजनीतिक पारे को सातवें आसमान पर पहुँचा दिया है। इन कयासों को बल मिल रहा है कि क्या Nitin Gadkari अब भाजपा का दामन छोड़कर कांग्रेस का हाथ थामने की तैयारी में हैं।
मुलाकात का आधिकारिक बहाना या बड़ी सियासी बिसात?
आधिकारिक तौर पर इस मुलाकात की वजह बसों और ट्रकों में आग लगने की घटनाओं के बाद केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए नए कानून को बताया जा रहा है। इस कानून में लाइसेंस फीस में भारी बढ़ोतरी की गई है, जिससे छोटे बॉडी मेकर्स के व्यापार पर संकट खड़ा हो गया है। इसी मुद्दे पर राहुल और प्रियंका गांधी ने Nitin Gadkari से मुलाकात कर राहत की गुहार लगाई। हालांकि, राजनीति के जानकार इसे महज एक बहाना मान रहे हैं। माना जा रहा है कि इस मुलाकात का असली मकसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व से बढ़ती दूरियों की टोह लेना है।
मोदी-शाह और Nitin Gadkari के बीच बढ़ती दरार
यह जगजाहिर है कि मोदी-शाह की जोड़ी और Nitin Gadkari के बीच वैचारिक और व्यक्तिगत स्तर पर टकराव बढ़ता जा रहा है। Nitin Gadkari ने कई मौकों पर अपनी ही सरकार की नीतियों और काम करने के तरीके पर सवाल उठाए हैं। विचारधारा की यह लड़ाई अब निजी टकराव में बदल चुकी है। इस मुलाकात ने उन चर्चाओं को हवा दे दी है कि क्या Nitin Gadkari आने वाले समय में विपक्षी खेमे का एक बड़ा और विश्वसनीय चेहरा बनने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।
पुराने बयानों से नेतृत्व को दिखाया आईना
नेतृत्व के साथ Nitin Gadkari की खटास पुरानी है। साल 2019 का उनका वह बयान आज भी याद किया जाता है, जिसमें उन्होंने कहा था कि “सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं, लेकिन अगर सपने पूरे नहीं हुए तो जनता उनकी पिटाई भी करती है।” इसे सीधे तौर पर ‘अच्छे दिन’ और नौकरियों के वादों पर एक तीखा प्रहार माना गया था। इसके अलावा, 2018 में जब भाजपा राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में चुनाव हारी, तब Nitin Gadkari ने दो-टूक कहा था कि सफलता के कई पिता होते हैं, लेकिन विफलता अनाथ होती है; हार की जिम्मेदारी भी नेतृत्व को लेनी चाहिए।
जातिवाद और सिस्टम के खिलाफ बेबाक तेवर
Nitin Gadkari की राजनीति हमेशा परफॉर्मेंस और स्पष्टवादिता पर टिकी रही है। जब पार्टी चुनावी रणनीति में जातिगत समीकरण साधने में जुटी थी, तब उन्होंने साफ कहा था कि “जो जाति की बात करेगा, उसे मैं कसके लात मारूँगा।” इतना ही नहीं, सरकारी कामकाज और ब्यूरोक्रेसी पर उनके ‘अविश्वास’ वाले बयानों ने बार-बार साबित किया है कि वे सिस्टम के भीतर रहकर भी गलत नीतियों से लड़ रहे हैं। विपक्ष द्वारा उन्हें प्रधानमंत्री पद का ऑफर मिलने की बात को सार्वजनिक करना भी यह संकेत देता है कि Nitin Gadkari और पीएमओ के बीच के रिश्ते अब पहले जैसे सहज नहीं रहे।
क्या वाकई होगा बड़ा राजनीतिक उलटफेर?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि राहुल और प्रियंका गांधी के साथ शुरू हुई यह बातचीत क्या वाकई किसी बड़ी राजनीतिक उठापटक का संकेत है? क्या Nitin Gadkari वास्तव में सत्ता के शीर्ष नेतृत्व को चुनौती देने के मूड में हैं? हालांकि अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन Nitin Gadkari का इतिहास बताता है कि वे अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करते। अब देखना यह होगा कि यह मुलाकात सिर्फ एक विभागीय चर्चा बनकर रह जाती है या फिर भारतीय राजनीति में एक नए युग की शुरुआत करती है।
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