Crime Against Women
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Crime Against Women: आपको गृह मंत्री अमित शाह का वो बयान याद है, जिसमें उन्होंने कहा था कि यूपी में 16 साल की बच्ची गहने लादकर रात के 12 बजे भी आराम से बाहर निकल सकती है. अब जरा इसकी हकीकत भी देखिए। यूपी में महिलाओं के खिलाफ अपराध के जो आंकड़े सामने आए हैं, उन्हें देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
- 2020 में 49,385 मामले
- 2021 में 56,083 मामले
- 2022 में 65,743 मामले
- 2023 में 66,381 मामले
- और 2024 में 66,398 मामले
महिलाओं के खिलाफ अपराध में नंबर 1 यूपी (Crime Against Women)
महिलाओं के खिलाफ अपराध के दर्ज हुए। यूपी पूरे देश में नंबर वन है महिलाओं के खिलाफ अपराध (Crime Against Women) में। और ये आंकड़े सिर्फ दर्ज हुए केस हैं। असलियत में तो बहुत से केस थाने तक भी नहीं पहुंच पाते। डर, दबाव, शर्म और पुलिस की लापरवाही की वजह से कितनी महिलाएं चुप रह जाती हैं, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।
देशभर के और भी बुरे हालात
पूरे देश की बात करें तो स्थिति और भी चिंताजनक है। 2014 में पूरे देश में महिलाओं के खिलाफ 3,39,457 मामले (Crime Against Women) दर्ज हुए थे। 2024 में ये बढ़कर 4,41,534 हो गए। 10 साल में अपराध में भारी बढ़ोतरी हुई है। इतना ही नहीं, देश के टॉप 5 राज्यों यूपी, महाराष्ट्र, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ सबसे ज्यादा अपराध हो रहे हैं। इनमें से ज्यादातर राज्यों में बीजेपी या बीजेपी समर्थित सरकारें हैं।
मोदी सरकार सिर्फ नारे लगाती
मोदी सरकार बार-बार बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा लगाती है। महिला आरक्षण बिल पर राजनीति करती है। लाल किले की प्राचीर से लेकर हर चुनावी रैली में मोदी जी महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। लेकिन NCRB के ये आंकड़े उनके सारे दावों को झूठा साबित कर रहे हैं। ये आंकड़े (Crime Against Women) सिर्फ नंबर नहीं हैं। ये उन लाखों मां-बहनों की चीख हैं, जिनकी सुरक्षा इस सरकार के 12 साल के शासन में भी नहीं हो सकी।
कहां गए महिला सुरक्षा के लिए बने कानून?
मोदी जी जब कहते हैं नारी शक्ति वंदन, तो याद आता है कि यूपी जैसा राज्य, जहां उनकी अपनी पार्टी की सरकार है, वहां महिलाओं पर अत्याचार (Crime Against Women) सबसे ज्यादा हो रहे हैं। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश में भी हालत बेहतर नहीं है। सरकार कहती है कि हमने कानून बनाए, सख्ती की। लेकिन अगर कानून बनाकर भी अपराध नहीं रुक रहे, तो फिर समस्या कहां है?
सरकार को नहीं महिलाओं की चिंता
असलियत ये है कि महिलाओं की सुरक्षा इस सरकार की प्राथमिकता ही नहीं लगती। नारे तो खूब लगाए जाते हैं, लेकिन जमीन पर सुरक्षा का माहौल नहीं बन पाया। लाल किले से लेकर चुनावी मंच तक सिर्फ जुमले चल रहे हैं। जब कोई छोटी बच्ची स्कूल जाते वक्त असुरक्षित महसूस करती है, जब कोई बेटी शाम को अकेले बाहर निकलने से डरती है, जब कोई महिला देर रात को घर के बाहर निकलने के नाम पर खौफ महसूस करती है, तब बेटी बचाओ का नारा कितना खोखला लगता है।
बीजेपी में भरे पड़े हैं दरिंदे
आज देश में, खासकर यूपी में हालात ये हैं कि रक्षक ही भक्षक बन चुके हैं। बेटियों की इज्जत बचाने की जिम्मेदारी जिनके ऊपर है, वही उसे लूटने का काम कर रहे हैं। महिलाओं के खिलाफ अपराध में अक्सर बीजेपी के ही नेता आगे दिखते हैं, चाहे वो कुलदीप सिंह सेंगर हों या फिर बृजभूषण शरण सिंह। फिर कोई कैसे इस सरकार से महिला सुरक्षा की उम्मीद कर सकता है?
क्या इन आंकड़ों पर जवाब देगी सरकार?
मोदी सरकार को इन आंकड़ों पर जवाब देना चाहिए। सिर्फ भाषणबाजी और फोटो सेशन से महिलाओं की सुरक्षा नहीं मिलेगी। उन्हें रात को बेखौफ घर लौटने का हक चाहिए। उन्हें हर जगह सम्मान और सुरक्षा चाहिए। अब अगली बार जब कोई नेता महिला सम्मान की बात करे, तो आप उससे ये आंकड़े पूछिए।
पूछिए कि 12 साल में यूपी जैसे राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध (Crime Against Women) क्यों बढ़े? पूछिए कि बेटी बचाओ का नारा सिर्फ वोट के लिए है या असल में कुछ किया भी है? पूछिए कि वो दिन कब आएगा, जब सच में इस देश की बेटी आधी रात को गहने लादकर घर से बाहर निकलने में डर नहीं महसूस करेगी।
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