Adani Group
Adani Group और केंद्र सरकार के रिश्तों को लेकर देश की राजनीति में लंबे समय से बहस छिड़ी हुई है। विपक्ष और आलोचकों का हमेशा से यह गंभीर आरोप रहा है कि देश के प्रधानमंत्री 140 करोड़ भारतीयों के लिए नीतियां बनाने के बजाय एक विशिष्ट कॉर्पोरेट घराने को फायदा पहुंचाने का काम करते हैं। जब भी मोदी दुनिया भर में भारत का मान बढ़ाने के लिए अंतरराष्ट्रीय दौरों पर जाते हैं, तो उन दौरों के ठीक बाद Adani Group के खाते में कोई न कोई बड़ा ग्लोबल प्रोजेक्ट आ जाता है।
आलोचक इसे कूटनीति नहीं, बल्कि इस समूह के लिए एक International Business Agent की तरह रास्ता साफ करने की क्रोनोलॉजी बताते हैं, जिसने अब एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।
अर्जेंटीना का जैकपॉट और दिल्ली कनेक्शन
ताजा मामला दक्षिण अमेरिकी देश अर्जेंटीना से सामने आया है, जहां Adani Group को एक ऐतिहासिक और बेहद बड़ा जैकपॉट हाथ लगा है। अडानी पोर्ट्स को अर्जेंटीना के पहले एलएनजी (LNG) एक्सपोर्ट प्रोजेक्ट के लिए 10 साल का मैरीन सर्विसेज कॉन्ट्रैक्ट मिला है। करीब 70 मिलियन डॉलर यानी 666 करोड़ रुपये की इस बड़ी डील के तहत सितंबर 2027 से भारत को सालाना 10 मिलियन टन एलएनजी भेजने का पूरा खाका तैयार किया गया है।
लेकिन इस डील की क्रोनोलॉजी को देखें तो सवाल उठते हैं कि क्या यह कॉन्ट्रैक्ट केवल काबिलियत के दम पर मिला है या इसके पीछे कोई खास सिफारिश थी। दरअसल, जुलाई 2025 में ठीक 57 साल बाद भारत के प्रधानमंत्री मोदी अर्जेंटीना के द्विपक्षीय दौरे पर गए थे, जहां राष्ट्रपति हाविएर मिलेई से बंद कमरों में हुई बातचीत का मुख्य एजेंडा तेल, गैस और ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना था। इसके ठीक एक साल बाद 2026 में Adani Group वहां फसल काटने पहुंच गया।
देश के भीतर ‘अडानी-निर्भरता’ का बढ़ता जाल
मोदी सरकार की यह मेहरबानी सिर्फ विदेशी दौरों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के भीतर भी एक अलग ही खेल चल रहा है। एक तरफ जहां सरकार दिन-रात टीवी चैनलों पर आकर भारत के ‘आत्मनिर्भर’ बनने का ढिंढोरा पीटती है, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर देश को ‘अडानी-निर्भर’ बनाने की पूरी तैयारी दिखती है।
जब आम जनता महंगाई, मंदी और बेरोजगारी के गहरे संकट से जूझ रही है, तब सरकारी नीतियां इस विशेष कॉर्पोरेट घराने को मालामाल करने का रास्ता साफ कर रही हैं। आज स्थिति यह हो चुकी है कि देश के बुनियादी और क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर के हर बड़े हिस्से पर Adani Group का सिक्का साफ तौर पर चलने लगा है।
जल, थल और नभ पर एकछत्र साम्राज्य
अगर देश के क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर इस समूह के कब्जे के आंकड़ों को देखें तो वह चौंकाने वाला है। भारत के कुल समुद्री व्यापार का करीब 24 से 25 प्रतिशत हिस्सा अकेले अडानी पोर्ट्स संभालता है, यानी देश में आने वाला हर चौथा जहाज इनके बंदरगाहों से गुजरता है। आसमान की तरफ देखें तो मुंबई, अहमदाबाद, जयपुर और लखनऊ सहित देश के 7 बड़े हवाई अड्डों का मालिकाना हक होने के कारण कुल हवाई यात्री ट्रैफिक का 20 से 25 फीसदी और एयर कार्गो का 33 फीसदी हिस्सा इसी समूह के नियंत्रण में है।
बिजली के क्षेत्र में यह समूह 12 हजार मेगावाट से ज्यादा की क्षमता के साथ देश की सबसे बड़ी प्राइवेट थर्मल पावर कंपनी बन चुका है, और भविष्य की ग्रीन एनर्जी के नाम पर भी Adani Group को 100 बिलियन डॉलर के निवेश का खुला मैदान दे दिया गया है।
रोजमर्रा की जरूरतों से लेकर डेटा संप्रभुता तक कब्जा
अंबुजा और एसीसी के साथ-साथ हाल ही में ओरिएंट सीमेंट के अधिग्रहण के बाद देश के सीमेंट बाजार के करीब 16.6 प्रतिशत हिस्से पर इस समूह का नियंत्रण स्थापित हो चुका है। घरों में इस्तेमाल होने वाली पीएनजी और गाड़ियों की सीएनजी के लिए 1160 से ज्यादा स्टेशनों और 13怀 लाख से अधिक घरों में इनका नेटवर्क फैला है।
हद तो यह है कि देश के भविष्य और डिजिटल संप्रभुता कहे जाने वाले डेटा सेंटर्स और सॉवरेन एआई के क्षेत्र में भी Adani Group ने 5 गीगावाट क्षमता के हाइपरस्केल डेटा सेंटर के लिए भारी-भरकम निवेश किया है। नोएडा से लेकर चेन्नई तक गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी विदेशी कंपनियों के साथ मिलकर भारतीय जनता के डेटा पर इस समूह का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार हो रहा है, जिससे आम आदमी के सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक के हर काम से इनकी जेब भर रही है।
वैश्विक मंचों पर विवादों का पुराना इतिहास
वित्त वर्ष 2025-26 में 1 लाख 52 हजार 967 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड कॉर्पोरेट निवेश करने वाले इस साम्राज्य के पीछे सरकारी ब्रांडिंग का एक लंबा इतिहास रहा है। श्रीलंका के बिजली प्रोजेक्ट के दौरान वहां की संसदीय समिति के सामने यह बयान आया था कि भारत की तरफ से Adani Group को प्रोजेक्ट देने का दबाव था।
इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया की कोयला खदानों का मामला हो जहां स्टेट बैंक ऑफ इंडिया तुरंत अरबों का लोन देने को तैयार हो गया था, या फिर बांग्लादेश को बिजली सप्लाई का ठेका और इजरायल में हाइफा पोर्ट का सौदा हो, हर जगह पैटर्न एक जैसा ही दिखता है। केन्या में भी पूर्व पीएम रेला ओडिंगा ने खुद खुलासा किया था कि भारतीय नेतृत्व ने उनसे इस बिजनेस ग्रुप के बारे में विशेष बातचीत की थी।
जनता के बुनियादी सवाल और सरकार की जवाबदेही
इन तमाम उदाहरणों और आंकड़ों को देखकर अंततः यह बड़ा सवाल उठता है कि क्या लोकतंत्र में जनता ने सरकार को इसलिए चुना था कि वह देश के संसाधनों और अंतरराष्ट्रीय दौरों को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी की बैलेंस शीट चमकाने के लिए इस्तेमाल करे। आज जब देश का नौजवान नौकरियों के भीषण संकट से जूझ रहा है और गरीब वर्ग महंगाई से त्रस्त है, तब पूरी व्यवस्था का ध्यान सिर्फ एक ही बिजनेस घराने को ‘Too Big to Fail’ बनाने में लगा दिखाई देता है।
अब मोदी सरकार को देश के सामने यह साफ करना ही होगा कि नीतियां 140 करोड़ भारतीयों के कल्याण के लिए बन रही हैं या फिर सिर्फ Adani Group के व्यापारिक साम्राज्य को बढ़ाने के लिए।
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