RSS
RSS (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) हमेशा से यह दावा करता आया है कि वह सरकार से एक धेला भी नहीं लेता और उसका पूरा तंत्र सिर्फ स्वयंसेवकों की गुरुदक्षिणा पर चलता है। संघ का यह भी तर्क रहा है कि उनका कोई औपचारिक रजिस्ट्रेशन नहीं है क्योंकि उन्हें सरकारी फंड की जरूरत ही नहीं पड़ती। लेकिन हाल ही में द न्यूज मिनट (TNM) की एक रिपोर्ट ने इन दावों की हकीकत पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इस सनसनीखेज खुलासे के मुताबिक, देश की सबसे बड़ी नवरत्न कंपनियों में से एक, ONGC (ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन) के कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) फंड का एक बड़ा हिस्सा संघ के इकोसिस्टम से जुड़े संगठनों को ट्रांसफर किया गया है, जिसने केंद्र की मोदी सरकार और RSS को सीधे कटघरे में ला खड़ा किया है।
ONGC के खजाने से करोड़ों की ‘मलाई’
साल 2013 से लेकर 2025 के बीच के आंकड़े बताते हैं कि ONGC ने सोशल वर्क के नाम पर RSS से जुड़े करीब 20 अलग-अलग संगठनों को कुल 670.97 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि दान की है।
यह खुलासा यह सोचने पर मजबूर करता है कि जनता की गाढ़ी कमाई और सरकारी तिजोरी का पैसा किस तरह गुपचुप तरीके से एक खास एजेंडे को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। जब एक तरफ RSS खुद को पूरी तरह आत्मनिर्भर बताता है, तब उसकी शाखाओं और सहयोगी संस्थाओं को मिले इस भारी-भरकम फंड ने पारदर्शिता और दावों के बीच की खाई को उजागर कर दिया है।
धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में खुला फंड का मुंह
इस पूरे खेल की कड़ियां साल 2014 से 2021 के बीच जुड़ती हैं, जब देश के पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान थे। उनके कार्यकाल के दौरान ONGC के खजाने का मुंह RSS के करीबी संगठनों के लिए पूरी तरह खोल दिया गया था।
उदाहरण के लिए, असम के सियु-का-फा अस्पताल को 434 करोड़ रुपये और नागपुर के नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट को 140 करोड़ रुपये जैसी मोटी रकम रेवड़ियों की तरह बांटी गई। हद तो तब हो गई जब खुद तत्कालीन मंत्री ने बद्रीनाथ धाम के विकास के नाम पर ONGC से 4.6 करोड़ रुपये दिलवाए और सोशल मीडिया पर इस पर गर्व भी जताया, जबकि बाद में उसी मंदिर में चोरी की खबर भी सामने आई।
हरदीप सिंह पुरी के दौर में भी जारी रहा खेल
धर्मेंद्र प्रधान के बाद जब हरदीप सिंह पुरी ने पेट्रोलियम मंत्रालय की कमान संभाली, तब भी सरकारी कंपनियों के पैसों का यह राजनीतिक इस्तेमाल बदस्तूर जारी रहा। इस दौरान ONGC के बोर्ड और उसकी CSR कमेटी में रीना जेटली और संबित पात्रा जैसे बीजेपी नेताओं को शामिल किया गया।
इसके बाद बंद कमरों में फैसले लेकर जनता की कमाई को RSS की प्रमुख शाखाओं, जैसे सेवा भारती, एकल विद्यालय और विद्या भारती के स्कूलों में करोड़ों रुपये के रूप में ट्रांसफर कर दिया गया। आंकड़े गवाही देते हैं कि 2025 तक ONGC ने अपने कुल CSR बजट का लगभग 14.7% हिस्सा सिर्फ और सिर्फ RSS समर्थित संगठनों पर लुटा दिया।
CAG की फटकार को भी किया दरकिनार
हैरानी की बात यह है कि जब देश के सबसे बड़े सरकारी ऑपरेटर यानी CAG (नियंत्रक-महालेखा परीक्षक) ने स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के लिए दिए गए 100 करोड़ रुपये के दान पर ONGC को नियमों के उल्लंघन के लिए जमकर फटकार लगाई थी, तब भी सरकार ने इससे कोई सबक नहीं लिया।
नियमों को ताक पर रखकर पीएम केयर्स फंड में 300 करोड़ रुपये और ऑरोविले फंड में 130 करोड़ रुपये झोंक दिए गए, क्योंकि इन जगहों पर भी RSS और बीजेपी के प्रभाव को मजबूत करना था। ऑडिटर की चेतावनियों को नजरअंदाज करना यह साफ दिखाता है कि सत्ता के गलियारों में नियमों से ज्यादा प्राथमिकता किसी खास विचारधारा को सींचने की थी।
दावों और हकीकत का बड़ा टकराव
यह पूरी कहानी साफ तौर पर यह चीखकर कह रही है कि एक तरफ मोहन भागवत मंचों से कहते हैं कि RSS का कोई रजिस्ट्रेशन नहीं है क्योंकि हम सरकारी मदद नहीं लेते, वहीं दूसरी तरफ मोदी सरकार के कद्दावर मंत्री सरकारी कंपनियों के पैसों से RSS के पूरे साम्राज्य को आर्थिक मजबूती दे रहे थे। यह सीधे-सीधे हितों के टकराव (Conflict of Interest) और नियमों की धज्जियां उड़ाने का मामला है।
अब देखना यह है कि इस भारी-भरकम खुलासे और चौतरफा घिरने के बाद पेट्रोलियम मंत्रालय और केंद्र सरकार देश की जनता को इस पर कोई तार्किक सफाई दे पाती है, या फिर हमेशा की तरह इस मुद्दे पर भी चुप्पी साध ली जाएगी।
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