Sonam Wangchuk
Sonam Wangchuk पिछले 21 दिनों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर कड़कड़ाती धूप और बेहद मुश्किल हालातों में शांतिपूर्वक भूख हड़ताल पर बैठे थे। शनिवार यानी 18 जुलाई की सुबह दिल्ली पुलिस ने लोकतंत्र को शर्मसार करते हुए उन्हें जबरन मंच से घसीटना शुरू कर दिया। वहां मौजूद प्रदर्शनकारियों ने जब अपनी आंखों के सामने इस अन्याय को देखा, तो उनका गुस्सा फूट पड़ा।
पुलिस ने किसी की एक न सुनी और उन्हें सफेद चादर की आड़ में मंच से घसीटकर जबरन गाड़ी में डालकर सफदरजंग अस्पताल ले गई। इस दौरान पूरे जंतर-मंतर पर भारी हंगामा, चीख-पुकार और धक्का-मुक्की का माहौल बन गया।
पेपर लीक के खिलाफ Sonam Wangchuk की जंग
देश में हुए भयावह पेपर लीक कांड को रोकने और छात्रों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए Sonam Wangchuk अपनी जान दांव पर लगाकर अनशन पर डटे हुए थे। देश के करोड़ों छात्रों और युवाओं के हक के लिए आवाज उठाने वाले Sonam Wangchuk नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। वह चाहते हैं कि देश के करोड़ों युवाओं का भविष्य अंधकार में न जाए, लेकिन केंद्र सरकार को छात्रों के आंसुओं से ज्यादा शायद अपनी कुर्सी और मंत्रियों को बचाने की फिक्र है।
21 दिनों का अनशन और सरकार की चुप्पी
एक सम्मानित देशभक्त Sonam Wangchuk लगातार 21 दिनों तक अनशन पर बैठे रहे और अपना शरीर गलाते रहे, लेकिन सरकार कान में तेल डालकर सोती रही। सत्ता के गलियारों में बैठे लोगों के इस संवेदनहीन रवैये से लोगों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। जो सरकार बड़े-बड़े दावों के ढोल पीटती है, वह देश के युवाओं के भविष्य के लिए लड़ने वाले Sonam Wangchuk जैसे सच्चे देशभक्त को एक अपराधी की तरह ट्रीट कर रही है, जो सरकार के अहंकार की पराकाष्ठा को दिखाता है।
जब इंदिरा गांधी ने दिखाई थी संवेदनशीलता
मोदी सरकार की इस संवेदनहीनता को देखकर आज देश के लोगों को 42 साल पुराना वो दौर याद आ रहा है, जब देश की कमान इंदिरा गांधी के हाथों में थी। साल 1984 में जब Sonam Wangchuk के पिता सोनम वांग्याल ने भी एक बड़ा आंदोलन किया था और वह अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठ गए थे, तब की सरकार ने विपक्ष के उस आंदोलन को कुचलने के बजाय संवेदनशीलता दिखाई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने खुद मुलाकात की थी, उनकी मांगों को समझा था और सम्मान के साथ उनका अनशन खत्म कराया था।
पिता को मिला था सम्मान, बेटे को मिली क्रूरता
इतिहास गवाह है कि तत्कालीन सरकार ने जिस आंदोलनकारियों के दर्द को समझा था, उनकी मांगें आगे चलकर साल 1989 में पूरी भी कर दी गई थीं। लेकिन आज Sonam Wangchuk के साथ जो व्यवहार हुआ, उसने इंदिरा गांधी के दौर और आज के मोदी राज के बीच एक बड़ा अंतर खड़ा कर दिया है। पिता के वक्त जहां कांग्रेस की सरकार ने आंदोलन को सम्मान दिया था, वहीं आज बेटे Sonam Wangchuk के वक्त बीजेपी की सरकार पुलिस के डंडे और बूटों से स्वागत कर रही है।
संवाद बनाम दमन की राजनीति
यह तुलना साफ दिखाती है कि वर्तमान सरकार किस कदर अहंकार के नशे में चूर हो चुकी है और छात्रों के हक की बात करने वालों से संवाद के बजाय सिर्फ दमन का रास्ता जानती है। इंदिरा गांधी के दौर में जहां आंदोलन करने वालों का सम्मान होता था, वहीं आज पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठाने पर Sonam Wangchuk को दिल्ली की सड़कों पर घसीटा जा रहा है। एक ऐसा इंसान जो सिर्फ इस देश के छात्रों के बर्बाद होते भविष्य के लिए भूखा बैठा था, उसके साथ ऐसा क्रूर व्यवहार यह दिखाता है कि व्यवस्था पूरी तरह संवेदनहीन हो चुकी है।
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