Indira Gandhi vs Narendra Modi

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Indira Gandhi vs Narendra Modi: एक प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं, जो अमेरिका से कभी डरी नहीं, बल्कि उसे बार बार उसकी औकात दिखाई. तो वहीं दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी हैं, जो ट्रंप के डर के मारे कांप रहे हैं. ट्रंप ने कहा ब्रिक्स छोड़ दो, छोड़ दिया. ट्रंप ने कहा चाबहार पोर्ट छोड़ दो, छोड़ दिया. ट्रंप ने कहा रूस से तेल खरीदना छोड़ दो, छोड़ दिया. ट्रंप ने कहा आपरेशन सिन्दूर छोड़ दो, छोड़ दिया. एक दिन ट्रंप कहेंगे देश छोड़ दो, तो शायद मोदी जी वो भी कर दें.

मोदी जी हर समय कांग्रेस के प्रधानमंत्रियों का नाम रटते रहते हैं, पर इसके साथ ही साथ अगर इन्होंने उन प्रधानमंत्रियों से कुछ गुण सीख लिए होते, तो आज भारत को ये दिन न देखने पड़ते.

Indira Gandhi ने पड़ोसी देशों में हो रहे अत्याचार पर आवाज उठाई

1971 का भारत पाकिस्तान युद्ध याद करिए. उस समय जब पाकिस्तानी सेना पूर्वी पाकिस्तान के लोगों पर अत्याचार कर रही थी और वो लोग भारत में शरण लेने लगे, तब इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने संकेत दे दिया था वो इसे चुपचाप नहीं देख सकतीं. आज बांग्लादेश में हिंदुओं के साथ इतना अत्याचार हो रहा है, उनकी हत्या हो रही है, तब भी खुद को हिंदूवादी सरकार बताने वाले मोदी जी चुपचाप बैठकर तमाशा देख रहे हैं.

अमेरिका को उसकी औकात दिखाई

1971 में इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने जब पाकिस्तान पर हमला करने का प्लान बनाया, तब वो इस मामले पर बातचीत के लिए अमेरिका पहुंचीं. उस समय तत्कालानी अमेरिकी प्रेसीडेंट रिचर्ड निक्सन ने एक तरह से उन्हें दबाव में लेने की कोशिश की. अपमानजनक व्यवहार किया. धमकी दी कि अगर भारत ने पूर्वी पाकिस्तान की ओर अपने सैनिक भेजने की हिम्मत की तो ये भारत के लिए बहुत बुरा होगा. इस धमकी से अच्छे खासे देश के राष्ट्रप्रमुखों को पसीना आ जाता, लेकिन इंदिरा गांधी तो अलग ही मिट्टी की बनीं थीं. उन्होंने अमेरिकी धमकी का मुंहतोड़ तोड़ जवाब दिया. इंदिरा गांधी ने बिना डरे बांग्लादेश में अपनी सेना उतार दी और पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए.

तो वहीं आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के दबाव में आकर देश को फायदा पहुंचाने वाले फैसलों को भी पलट रहे हैं. भारत को रूस, चीन, ईरान और दक्षिण अफ्रीका के साथ ब्रिक्स नौसैनिक अभ्यास में आमंत्रित किया गया, तो ट्रंप के डर से मोदी सरकार ने इसमें भाग लेने से इंकार कर दिया. इतना ही नहीं, अमरीका की धमकी के चलते भारत ईरान के साथ बनने वाले चाबहार पोर्ट योजना से भी बाहर हो गया है, जबकि ये प्रोजेक्ट हमारे लिए बेहद अहम था

कूटनीति से देश की रक्षा की Indira Gandhi ने

और ऐसा नहीं है कि अमेरिका सिर्फ आज ही भारत को धमकाने की कोशिश कर रहा है, इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) के समय भी अमेरिका ने दादागिरी दिखाने की बहुत कोशिश की. लेकिन इंदिरा गांधी ने अपनी कूटनीति से अमेरिका को हर मोड़ पर मात दे दी. उदाहरण के लिए इंदिरा गांधी ने जब अमेरिका की धमकी की अनदेखी करते हुए बांग्लादेश में अपनी सेना उतार दी तो अमेरिका बुरी तरह झल्ला गया. फिर भारत को सबक सिखाने के लिए सातवां बेड़ा ( यानी USS Enterprise समेत युद्धपोतों का एक बड़ा समूह) बंगाल की खाड़ी में भेज दिया.

लेकिन इंदिरा गांधी भी कम बुद्धिमान नहीं थीं. उन्होंने पहले ही इस खतरे को भांप लिया था. दिसंबर में पाकिस्तान पर हमला किया, तो उसके पहले अगस्त 1971 में सोवियत संघ के साथ एक 20 वर्षीय समझौता कर लिया था. ये समझौता था- भारत-सोवियत संघ मैत्री, शांति और सहयोग संधि ( यानी Indo-Soviet Treaty of Peace, Friendship and Cooperation). इस समझौते का मतलब था कि अगर अमेरिका या चीन ने भारत पर हमला किया, तो सोवियत संघ भारत की मदद के लिए आगे आएगा.

इसी समझौते की वजह से जब अमेरिका ने बंगाल में खाड़ी में सेना भेजी तब सोवियत नौसेना ने बंगाल की खाड़ी में अपनी पनडुब्बियां तैनात कर दीं. इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की इस कूटनीतिक चाल ने अमेरिका और चीन के किसी भी संभावित हस्तक्षेप को रोक दिया.

वहीं हमारे आज के महामानव को देखिए. पाकिस्तान ने जब पहलगाम में आतंकी हमला किया, तो इन्होंने जवाब में ऑपरेशन सिंदूर चलाया. लेकिन अमेरिका ने जैसी ही दबाव बनाया,थोड़ी धमकी दी, तो मोदी सरकार तुरंत पीछे हट गई. पाकिस्तान के साथ समझौता कर लिया. ये भी चाहते तो इंदिरा गांधी की तरह डटकर खड़े हो सकते थे, लेकिन इनके अंदर हिम्मत ही नहीं थी.

Indira Gandhi ने विदेश नीति टॉप क्लास की रखी

इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) ने 1971 के समय विदेश नीति भी बड़ी ही समझारी से हैंडल किया. उन्होंने अमेरिका और पश्चिमी देशों के दबाव को कम करने के लिए शानदार कूटनीति अपनायी. पहले उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी की यात्राएं कीं. उन्हें समझाने की कोशिश की कि यह मानवाधिकारों का उल्लंघन है. और जब अमेरिका ने पाकिस्तानी सेना का समर्थन किया, तो इंदिरा गांधी ने सोवियत संघ, फ्रांस और कुछ अन्य देशों को भारत के पक्ष में ला दिया.

वहीं दूसरी तरफ, ऑपरेशन सिंदूर के वक्त मोदी सरकार एक भी देश को भारत के पक्ष में नहीं ला सकी. अमेरिका, तुर्की से लेकर चीन तक, हर देश पाकिस्तान के साथ खड़ा था. सबने उसकी मदद की, लेकिन भारत के लिए किसी देश ने एक शब्द नहीं कहा.

व्यापार की धमकी से भी नहीं डरीं

इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) की मजबूद पर्सनैलिटी ही थी, जो 1971 के युद्ध के बाद अमेरिका भारत से नाराज तो था, लेकिन सीधे तौर पर कोई और धमकी नहीं दे पाया. हालांकि तब निक्सन प्रशासन ने भारत को दबाव में लाने और उसे सजा देने के लिए कई कदम उठाए. भारत को दी जाने वाली आर्थिक और सैन्य सहायता में कटौती कर दी. अमेरिका ने वर्ल्ड बैंक और अन्य संस्थाओं के जरिए भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की. लेकिन भारत ने सोवियत संघ और अन्य मित्र देशों से समर्थन लेकर इस असर को कम कर लिया.

और अब आज का भारत देखिए. ट्रंप टैरिफ की धमकी देकर जो मन कर रहा है, भारत से करवा रहे हैं. रूसी तेल लेने से मना कर दिया ये कहकर की टैरिफ और बढ़ा देंगे, तो डर के मारे मोदी सरकार ने रूस से सस्ता तेल लेना बंद कर दिया. इतने डरपोंक हैं ये. इसीलिए समझदार लोग कहते हैं, अगर इंदिरा गांधी के एक दो गुण भी मोदी जी ने सीख लिया होता, तो आज भारत की छवि कुछ और ही होती.


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