Drugs in Bihar
Drugs in Bihar: मोदी सरकार का नाम भारतीय जनता पार्टी न होकर, लफ़्फ़ाज़ी नेता पार्टी होना चाहिए। क्योंकि उसके नेता यही तो कर रहे हैं। अब उनके एक और बड़े दावे की पोल खुल गई है। बिहार में बढ़ रही नशे की तस्करी पर इंडियन एक्सप्रेस ने एक रिपोर्ट की है, जिसमें खुलासा हुआ है कि बिहार में नशा बीजेपी सरकार में रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ गया है। वहीं, अमित शाह और बीजेपी के दूसरे नेता कभी पंजाब, तो कभी मध्य प्रदेश में बिहार की शराबबंदी का उदाहरण देते हैं।
बिहार में शराबबंदी तो 2016 में हो गई थी, लेकिन क्या इससे नशे पर लगाम लग पाई? रिपोर्ट ने राज्य में बढ़ते ड्रग्स कारोबार का खुलासा किया है। आँकड़ों के मुताबिक, 2019 में जहाँ NDPS के 697 मामले दर्ज हुए थे, वहीं सम्राट चौधरी के राज में 2026 के शुरुआती पाँच महीनों में ही यह आँकड़ा 1,905 तक पहुँच गया है। यानी बिहार में अब चिंता सिर्फ शराब की नहीं, बल्कि हेरोइन, ब्राउन शुगर और दूसरे नशीले पदार्थों की भी है। इसकी चपेट में युवा और नाबालिग, सभी आ रहे हैं।
नशा मुक्ति पर बीजेपी के दावे और हकीकत
रिपोर्ट के बाद लोग कह रहे हैं कि जो पार्टी सत्ता में होने के बाद बिहार से नशा दूर नहीं कर पाई, वो पंजाब को क्या नशामुक्त करेगी? बता दें, लुधियाना की एक सभा को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा था कि हम 31 दिसंबर 2029 तक पंजाब को नशामुक्त बना देंगे। अरे मंत्री जी, अपनी सरकार वाले राज्य बिहार में नशा तो रुका नहीं और जगह-जगह जाकर झूठ बोलते हैं कि हमने शराबबंदी कर दी। रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार के ब्लैक मार्केट में शराब की एक बोतल 1,500 रुपये तक में बिकती है, जबकि स्मैक की छोटी खुराक 300 से 500 रुपये में मिल सकती है। तस्करी के नेटवर्क ग्रामीण इलाकों तक फैल रहे हैं और बिहार की बीजेपी सरकार इसे रोकने में नाकाम है।
वहीं, दिल्ली में भी बीजेपी का यही नाटक चल रहा है। मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता कह रही हैं कि अवैध शराब के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई जा रही है, जबकि दिल्ली में शराब पीकर गाड़ी चलाने, क्लबों में शराब को लेकर लड़ाई आदि की खबरें आम हैं।
Drugs in Bihar: 10 साल में भी शराब पर नहीं लगी लगाम
अब वापस बिहार पर आते हैं, जहाँ सरकार ने शराबबंदी कर रखी है। बिहार में पिछले 10 साल में पुलिस करीब 3.16 करोड़ लीटर शराब जब्त कर चुकी है और शराबबंदी कानून के तहत लगभग 7.15 लाख गिरफ्तारियाँ हुई हैं। ये आँकड़े बताते हैं कि अवैध शराब का कारोबार खत्म होना तो दूर, कम भी नहीं हुआ है। लेकिन अब नशे का बाज़ार बदल रहा है। रिपोर्ट में एक और खतरनाक नाम सामने आया है—‘कोटा’, जो कच्ची हेरोइन का एक रूप है। इसकी एक छोटी शीशी की कीमत करीब 300 से 400 रुपये बताई गई है। तस्करी के नेटवर्क म्यांमार से पूर्वोत्तर भारत के रास्ते बिहार तक पहुँच रहे हैं। यानी सीमा भी सुरक्षित नहीं रही है।
अब फैसला आपको करना है कि बिहार के नेताओं के नशामुक्त भारत के दावों पर यक़ीन करना है या बिहार की शराबबंदी की हक़ीक़त से सबक लेना है।
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