BJP Role in Collegium
BJP Role in Collegium: क्या सुप्रीम कोर्ट में जजों की पोस्टिंग से पहले केंद्र सरकार यानी BJP से ‘परमिशन’ ली जा रही थी? जी हां दोस्तों, ये कोई ट्विटर से आया आरोप नहीं है, बल्कि ये बात सुप्रीम कोर्ट के ही पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल कह रहे हैं। अपनी नई किताब ‘Without Fear or Favour’ में उन्होंने सिस्टम की ऐसी पोल खोली है, जिसे सुनकर आपको समझ आ जाएगा कि केंद्र सरकार कैसे देश की सबसे बड़ी अदालत पर अपना कंट्रोल चाहती है। चलिए, बिना किसी फ़िल्टर के डिकोड करते हैं कि पर्दे के पीछे क्या गेम चल रहा है।
भारत में जजों की नियुक्ती का क्या है नियम?
देखिए भारत में जजों की नियुक्ति करने के लिए एक ‘कॉलेजियम’ है, यानी सुप्रीम कोर्ट के सीनियर मोस्ट जजों का ग्रुप। भारत की व्यवस्था में साफ है कि न्यायपालिका एकदम स्वतंत्र रहेगी, सरकार का कोई दबाव नहीं चलेगा। लेकिन जस्टिस कौल का कहना है कि पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ सरकार के मामले में ज़रूरत से ज़्यादा ‘सॉफ्ट’ थे।
कौल ने साफ लिखा है कि डीवाई चंद्रचूड़ के समय कई बार तो कॉलेजियम की ऑफिशियल मीटिंग से पहले ही सरकार की ‘हां’ लेने की कोशिश की जाती थी। यानी जिस सरकार के खिलाफ कोर्ट को नागरिकों के हक में फैसले सुनाने होते हैं, उसी सरकार से पूछकर जज तय हो रहे हैं? बातचीत करना एक बात है, लेकिन अपॉइंटमेंट से पहले सरकार से ‘मंजूरी’ लेना? ये तो सीधा-सीधा न्यायपालिका की आज़ादी के साथ समझौता है!
किताब के बाद क्या कह रहे लोग? (BJP Role in Collegium)
कुछ लोग इस किताब के बाद कह रहे हैं कि जस्टिस संजय किशन कौल ने कुछ नया नहीं बताया है। सबको पता है, जजों की नियुक्ति में सरकार की चलती है। इस किताब के आने के बाद आपको लग रहा होगा, सरकार और न्यायपालिका की मिलीभगत का खुलासा पहली बार हुआ है, तो ठहरिए, ऐसे आरोप पहले भी लग चुके हैं, जिसके कुछ फैक्ट्स हम आपको बताते हैं।
चंद्रचूड़ का मोदी सरकार से ज़रूरत से ज़्यादा लगाव था। उन्होंने चीफ जस्टिस रहते हुए पीएम मोदी को अपने घर बुलाया और गणेश पूजा करवाई। साल 2020 में रिटायरमेंट के बाद बीजेपी ने पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को राज्यसभा भेजा, क्योंकि उन्होंने राम मंदिर पर फैसला सुनाया था। अभी पिछले महीने ज्ञानेश कुमार की बेटी का केस सुप्रीम कोर्ट में गया। सुनवाई के दौरान ऑडियो म्यूट कर दी गई।
इतना ही नहीं, रोस्टर के हिसाब से केस जस्टिस बी.वी. नागरत्ना की बेंच को सौंपा जाना चाहिए था, लेकिन केस को जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच के सामने लिस्ट कर दिया गया। खास बात है कि जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के बेटे सिद्धार्थ शर्मा, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चुनाव आयोग के वकील हैं। आप जब गौर से देखेंगे तो पाएंगे, सरकार और ज्यूडिशियरी का बहुत गहरा कनेक्शन है।
जब चंद्रचूड़ से भिड़ गए कौल
अब ज़रा कौल की किताब ‘Without Fear or Favour’ में छपी एक अंदर की कहानी बताते हैं। कौल ने एक वाकया बताते हुए लिखा, सुप्रीम कोर्ट में 6 खाली सीटों के लिए जजों के नाम फाइनल होने थे। 5 नामों पर सारे जज राज़ी थे। लेकिन मीटिंग वाले दिन अचानक CJI चंद्रचूड़ एक छठा नाम ले आते हैं।
बाकी जजों को तुरंत डाउट हुआ कि भाई, ये छठा नाम पक्का केंद्र सरकार की विश-लिस्ट से आया है! हद तो तब हो गई जब मीटिंग के बीच में ही चंद्रचूड़ ने जस्टिस कौल को साइड में ले जाकर पूछा, “क्या मुझे सरकार की राय जानने के लिए फोन करना चाहिए?” जस्टिस कौल का शक यहीं यकीन में बदल गया। उन्होंने तुरंत मुंह पर मना किया कि मीटिंग के बीच में सरकार को फोन लगाना बिल्कुल गलत मैसेज देगा। आखिरकार बाकी जज अड़ गए, वो 5 नाम पास हुए और सरकार के फेवरेट माने जा रहे उस छठे नाम को रिजेक्ट कर दिया गया।
किन जजो पर दबाव डालती है सरकार? (BJP Role in Collegium)
जस्टिस कौल ने अपनी किताब में ये भी बताया कि सरकार सिर्फ उन्हीं जजों की इज्जत करती है, जिनकी रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है! आज के टाइम में जब केंद्र सरकार हर संवैधानिक संस्था पर अपना दबदबा बनाना चाहती है, वहां अगर जज ही झुकने लगेंगे तो लोकतंत्र का ‘चेक्स एंड बैलेंसेज’ कौन संभालेगा?
कौल ने किताब में ये भी क्लियर किया कि कोर्ट का काम विपक्ष बनना नहीं है, जैसे राफेल केस में उन्होंने सबूतों के आधार पर सरकार के खिलाफ याचिकाएं खारिज की थीं। कोर्ट को बस कानून के हिसाब से चलना चाहिए, न कि सत्ता के दबाव में। लेकिन जब सरकार को लगता है कि कोई जज झुक सकता है, तो ये सरकार उसे पूरा झुकाने की कोशिश करती है। जस्टिस कौल ने साफ कहा कि सरकार को पता था कि वो दबाव में आने वाले इंसान नहीं हैं, इसलिए उन्हें इग्नोर नहीं किया जा सकता था।
किताब ने साफ कर दी ये बात
इस किताब से एक बात साफ है, जब सत्ता में बैठी बीजेपी सरकार हर जगह अपना कंट्रोल चाहती हो, तब जस्टिस कौल का ये खुलासा बहुत बड़ा रेड फ्लैग है। अगर जजों की नियुक्ति में ही सरकार की मर्जी चलने लगी, तो आम आदमी को इंसाफ क्या खाक मिलेगा? आपको क्या लगता है, क्या केंद्र सरकार के सामने झुकना सही था? या जस्टिस कौल की तरह हर जज को सरकार को उसकी हद दिखानी चाहिए? कमेंट्स में अपनी राय खुलकर लिखो, और वीडियो पसंद आया तो इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करो ताकि सबको पता चले कि सिस्टम के अंदर क्या चल रहा है!
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