Gyanesh Kumar
Gyanesh Kumar के मुख्य चुनाव आयुक्त बनने के बाद चुनाव आयोग के कामकाज पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं और उनकी मुश्किलें अब चरम पर पहुंच चुकी हैं। चुनाव आयोग के अंदर कथित तौर पर चल रही तानाशाही और गड़बड़ियों का पूरा कच्चा-चिट्ठा अब देश के सामने आने लगा है।
विपक्ष के आरोपों और मीडिया खुलासों के बीच देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी इस मामले पर नकेल कसना शुरू कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख यह संकेत दे रहा है कि संवैधानिक मर्यादाओं के उल्लंघन के आरोपों से अब कोई बच नहीं पाएगा। विपक्ष ने इस मुद्दे को लेकर सरकार और आयोग को घेरा है, जिससे सत्ता के गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख और नोटिस
मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त Gyanesh Kumar, दोनों चुनाव आयुक्तों डॉ. सुखबीर सिंह संधू और डॉ. विवेक जोशी, डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग तथा डीजी आईटी सीमा खन्ना को सीधा नोटिस जारी किया है।
अदालत में दाखिल याचिकाओं में Gyanesh Kumar पर अपने पद का दुरुपयोग करने के सीधे आरोप लगाए गए हैं। याचिकाओं के जरिए मांग की गई है कि आयोग के फैसलों और मूल रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच कराई जाए, Gyanesh Kumar को तुरंत पद से निलंबित किया जाए, एक रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट जज की अध्यक्षता में एसआईटी का गठन हो, ईसीआई-नेट व ईआरओ-नेट डेटाबेस का फॉरेंसिक ऑडिट करवाया जाए और 30 राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में हटाए गए 13 करोड़ नामों की गहनता से जांच हो।
तुरंत निलंबन पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान जब Gyanesh Kumar को तुरंत निलंबित करने की मांग उठी, तो सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस अंतरिम मांग पर तुरंत आदेश देने से इनकार कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि केवल किसी न्यूज रिपोर्ट में लगे आरोपों के आधार पर किसी को निलंबित नहीं किया जा सकता, क्योंकि Gyanesh Kumar को अचानक हटा देने से चुनाव आयोग का पूरा कामकाज ठप हो जाएगा और चुनाव कराने में बाधा आएगी।
हालांकि, अदालत ने चेतावनी दी कि 10 दिनों में स्थिति नहीं बिगड़ेगी और यदि जांच में यह साबित होता है कि फैसले अन्य आयुक्तों की सहमति के बिना और गलत तरीके से लिए गए थे, तो कोर्ट के पास उन्हें रद्द करने का पूरा अधिकार है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट और अंदरूनी विरोध
इस पूरे विवाद की जड़ में इंडियन एक्सप्रेस की वह रिपोर्ट है, जिसने आयोग के भीतर के मतभेदों को उजागर किया। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में आयोग के मनमाने फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार लिखित रूप से अपनी घोर आपत्ति दर्ज कराई थी।
Gyanesh Kumar के कार्यकाल के दौरान स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि एक ही दिन में 4-4 आपत्तियां दर्ज कराई गईं। दोनों आयुक्तों ने आरोप लगाया कि वोटर लिस्ट से नाम जोड़ने, हटाने और दोबारा शामिल करने की प्रक्रिया में भारी गड़बड़ी की जा रही है, विशेषकर पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट से नाम हटाने पर गंभीर सवाल खड़े किए गए।
डेटाबेस का केंद्रीकरण और नियमों में बदलाव
वोटर डेटाबेस के केंद्रीकरण को लेकर भी बड़े सवाल उठाए गए हैं। आरोप हैं कि पूरे डेटाबेस का नियंत्रण दिल्ली में केंद्रित किया जा रहा था, जिस पर विवेक जोशी ने सवाल उठाते हुए कड़े ऑडिट की मांग की थी ताकि केवल अधिकृत अधिकारी ही डेटाबेस में बदलाव कर सकें। आयोग के फैसलों में Gyanesh Kumar की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए आयुक्तों ने नए वोटरों से जुड़े कई कदमों को अनधिकृत करार दिया।
नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन के लिए फॉर्म 6 में बिना कानूनी प्रक्रिया के बदलाव किए गए। गोवा का उदाहरण भी सामने आया, जहाँ इलेक्टरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स द्वारा सही पाए गए 97 पात्र वोटरों के नाम सॉफ्टवेयर और केंद्रीकरण की वजह से अंतिम लिस्ट में शामिल नहीं हो सके।
कानूनी शिकंजा और निष्पक्ष जांच की मांग
इन खुलासों से साफ है कि संवैधानिक संस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो चुके हैं। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग को राजनीतिक फायदे के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है, हालांकि अब पूरा मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है।
Gyanesh Kumar के नेतृत्व वाले आयोग के फैसलों पर जिस तरह से सवाल उठे हैं, उससे यह स्पष्ट है कि मनमानी अधिक दिनों तक नहीं चल सकती। सुप्रीम कोर्ट का कानूनी शिकंजा कसने के बाद अब आने वाले दिनों में निष्पक्ष जांच और सभी पक्षों के जवाब के बाद ही स्थिति पूरी तरह साफ हो पाएगी।
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