Mamta Banerjee
Mamta Banerjee को जिस कांग्रेस ने पाल-पोसकर बड़ा किया, जिसने उन्हें राजनीति के ककहरे से लेकर दिल्ली के गलियारों तक पहचान दिलाई, उन्होंने उसी कांग्रेस की पीठ में छुरा घोंपने का काम किया। लेकिन राजनीति का पहिया ऐसा घूमा कि आज कांग्रेस को बर्बाद करते-करते Mamta Banerjee खुद बर्बादी के कगार पर पहुंच गई हैं। जिस हाथ को उन्होंने कभी झटका था, आज उसी हाथ को थामने के लिए वह मजबूर हो गई हैं।
1984 का वह ऐतिहासिक मोड़ और जादवपुर की जीत
कहानी की शुरुआत होती है साल 1984 से, जब दिल्ली में बैठी कांग्रेस ने एक युवा चेहरे पर भरोसा जताया और उन्हें सीधे कम्युनिस्टों के गढ़ जादवपुर से दिग्गज सोमनाथ चटर्जी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतार दिया। कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने उनके लिए पसीना बहाया, जनता ने हाथ का साथ दिया और Mamta Banerjee पहली बार सांसद बनकर दिल्ली पहुंचीं। राजीव गांधी ने उन्हें अपनी छोटी बहन की तरह माना।
हाजरा क्रॉसिंग का हमला और कांग्रेस का अटूट साथ
जब 16 अगस्त 1990 को कोलकाता के हाजरा क्रॉसिंग पर सीपीएम के गुंडों ने Mamta Banerjee के सिर पर लाठियों से जानलेवा हमला किया, तब वह लहूलुहान होकर जिंदगी और मौत के बीच झूल रही थीं। उस वक्त राजीव गांधी ने आगे बढ़कर कोलकाता के सबसे बड़े वुडलैंड्स अस्पताल में उनके इलाज का पूरा जिम्मा उठाया, यहां तक कि उन्हें विदेश भेजने की तैयारी भी कर ली थी। राजीव गांधी के जाने के बाद भी कांग्रेस ने अपनी इस बहन का साथ नहीं छोड़ा और उन्हें पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में केंद्रीय मंत्री बनाया।
टीएमसी का गठन और बीजेपी के साथ गठबंधन का दौर
जैसे ही कांग्रेस का कुछ समय के लिए बुरा दौर शुरू हुआ, वैसे ही Mamta Banerjee के तेवर बदल गए। जिस पार्टी ने उन्हें पहचान दी, उसी पर कम्युनिस्टों से समझौते का मनगढ़ंत आरोप मढ़कर दिसंबर 1997 में उन्होंने अपनी अलग पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) बना ली। स्वार्थ की राजनीति यहीं नहीं रुकी। धर्मनिरपेक्षता का दावा करने वाली Mamta Banerjee की पार्टी टीएमसी उसी बीजेपी की गोद में जाकर बैठ गई, जिसे वह आज पानी पी-पीकर कोसती हैं।
2011 में कांग्रेस के कंधे पर चढ़कर सत्ता तक का सफर
साल 2009 के लोकसभा चुनाव और 2011 के बंगाल विधानसभा चुनाव के समय जब बंगाल से वामपंथियों को उखाड़ना था, तब Mamta Banerjee को फिर कांग्रेस की याद आई। कांग्रेस ने बड़ा दिल दिखाते हुए उनके साथ गठबंधन किया। 294 सीटों में से इस गठबंधन को 227 सीटें मिलीं, जिसमें टीएमसी 184 और कांग्रेस 42 सीटों पर जीती। कांग्रेस के कंधे पर चढ़कर Mamta Banerjee पहली बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचीं, लेकिन सत्ता हाथ में आते ही उनका असली रंग सामने आ गया।
यूपीए से समर्थन वापसी और विपक्ष के साथ तल्खी
सिर्फ एक साल के भीतर सितंबर 2012 में उन्होंने केंद्र की यूपीए सरकार से खुदरा क्षेत्र में एफडीआई और एलपीजी सिलेंडरों की संख्या सीमित करने का बहाना बनाकर समर्थन वापस ले लिया। इतना ही नहीं, बंगाल में कांग्रेस के मंत्रियों को इस्तीफा देने पर मजबूर किया और मालदा-मुर्शिदाबाद जैसे कांग्रेस के मजबूत गढ़ों में उनके विधायकों को तोड़कर कांग्रेस को ही खत्म करने की साजिश रचने लगीं। घमंड इस कदर सिर चढ़कर बोलने लगा कि Mamta Banerjee ने कभी विपक्षी एकता वाले इंडिया अलायंस की बैठकों से दूरी बना ली, तो कभी राहुल गांधी के अभियानों का विरोध किया।
मई 2026 के चुनाव परिणाम और कांग्रेस का दोबारा सहारा
कांग्रेस को मिटाने की चाहत रखने वाली Mamta Banerjee को मई 2026 के विधानसभा चुनाव में जनता ने ऐसा सबक सिखाया कि उनके पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। इस चुनाव में बीजेपी ने 207 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया, जबकि टीएमसी सिमटकर महज 80 सीटों पर आ गई और खुद Mamta Banerjee अपनी ही गढ़ भवानीपुर सीट से पूर्व सहयोगी सुवेंदु अधिकारी से चुनाव हार गईं।
आज जब पार्टी के भीतर भारी बगावत पैदा हो गई है और 80 में से 58 विधायक तथा 28 में से 20 सांसद बागी हो चुके हैं, सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बड़ाईक जैसे बड़े राज्यसभा सांसदों ने इस्तीफा दे दिया है और सयानी घोष भी बगावत की राह पर हैं, तब चारों तरफ से नाव डूबने पर उन्हें एक बार फिर सोनिया गांधी और राहुल गांधी की कांग्रेस की याद आई है, जिसका दिल इतना बड़ा है कि उसने अपने इस दुस्साहसी बच्चे की सारी खताओं को माफ कर दिया।
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