Modi Government

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Modi Government के अमृतकाल के दावों और भारत को ‘विश्वगुरु’ बनाने के सपनों के बीच देश की एक बहुत बड़ी आबादी आजीविका के गंभीर संकट से जूझ रही है। जिस भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने की बात कही जा रही है, उसकी आधी आबादी आज सिर्फ मजदूरी करके पेट पालने पर मजबूर है।

नीतिगत विफलताओं के कारण देश का युवा दर-दर भटक रहा है और हालिया आंकड़े बताते हैं कि देश की 45.1% यानी 65.4 करोड़ आबादी लेबर क्लास बनकर रह गई है। 15 से 29 वर्ष के 7.65 करोड़ युवा ऐसे हैं जिन्हें ‘NEET यूथ’ कहा जा रहा है, जो ना तो पढ़ाई कर पा रहे हैं, ना किसी रोजगार से जुड़े हैं और ना ही किसी ट्रेनिंग का हिस्सा हैं। विकास की इस रफ्तार के बीच आम जनता का यह सवाल उठाना लाजिमी है कि क्या यही Modi Government का असली अमृतकाल है।

नीति आयोग की रिपोर्ट ने खोली दावों की पोल

नीति आयोग की रिपोर्ट ‘Reimagining Skilling for Viksit Bharat 2047’ के आंकड़े देश की भयावह तस्वीर पेश करते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, देश की कुल 145 करोड़ आबादी में से 54.9% यानी 79.6 करोड़ लोग लेबर फोर्स से पूरी तरह बाहर हैं, जिनमें 29.1 करोड़ छात्र, 27 करोड़ बच्चे या बुजुर्ग और 14.7 करोड़ अन्य लोग शामिल हैं।

जो लोग लेबर फोर्स का हिस्सा हैं, उनमें से भी मात्र 21.7% लोगों के पास ही नियमित सैलरी वाली पक्की नौकरी है। इसके अलावा 8.4% लोग खुद का छोटा-मोटा काम करते हैं, जबकि 19.8% लोग दिहाड़ी मजदूरी करने पर विवश हैं। कॉलेज से डिग्री लेकर निकलने वाले युवाओं में से महज 8.25% को ही अपनी योग्यता के अनुसार रोजगार मिल पा रहा है, जो Modi Government की रोजगार नीतियों पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

सरकारी महकमों में बढ़ती रिक्तियां और घटते पद

रोजगार के अवसर सृजित करने के दावे करने वाली Modi Government में सरकारी नौकरियों के खाली पदों का ग्राफ लगातार बढ़ता गया है। वर्ष 2015 में केंद्र सरकार में 4.21 लाख पद खाली थे, जो 2024 में बढ़कर 8.24 लाख हो गए, यानी रिक्तियों की हिस्सेदारी 11.5% से बढ़कर 21% पर पहुंच गई। स्वीकृत पदों की संख्या में वृद्धि तो हुई, लेकिन भरे हुए पदों में 1.29 लाख की भारी कमी दर्ज की गई। पक्की नौकरियां देने के बजाय आउटसोर्सिंग और ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा दिया गया है।

सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) में 2015 में जहां 18.6% कर्मचारी ठेके पर थे, वहीं 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 49.1% हो गया है। वर्ष 2015 में 298 सरकारी कंपनियों के 15.87 लाख कर्मचारियों में से 2.95 लाख ठेके पर थे, जबकि 2025 में 475 कंपनियों के 15.42 लाख कुल कर्मचारियों में से 7.58 लाख से अधिक लोग ठेकेदारी व्यवस्था में ढकेले जा चुके हैं, जो दिखाता है कि Modi Government पक्की नौकरियों को समाप्त कर रही है।

प्रमुख विभागों में खाली पड़े लाखों पद

Modi Government के तहत देश के अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील विभागों में भी कर्मचारियों की भारी कमी बनी हुई है। गृह मंत्रालय में खाली पदों की संख्या 58 हजार से बढ़कर 1.10 लाख पहुंच चुकी है। डिफेंस सिविलियन के क्षेत्र में 2.42 लाख पद खाली हैं, जहां रिक्ति दर 43.4% के स्तर पर है। डाक विभाग में खाली पद 7,561 से बढ़कर 61,546 हो गए हैं।

इसके अलावा कॉमर्स विभाग में 55.4%, सिविल एविएशन में 45.2% और लेबर डिपार्टमेंट में 41.5% पद खाली पड़े हैं। जिस रेलवे में 2015 के दौरान एक भी पद खाली नहीं था, वहां आज 2.40 लाख पद खाली पड़े हैं, फिर भी भर्ती प्रक्रियाएं ठप हैं।

आउटसोर्सिंग का खेल और युवाओं का भविष्य

सरकारी महकमों में लाखों पद खाली होने के बावजूद Modi Government युवाओं को पक्की नौकरी देने के बजाय आउटसोर्सिंग को तरजीह दे रही है। आरोप हैं कि निजी कंपनियों को ठेके बांटे जा रहे हैं ताकि वे भारी मुनाफा कमा सकें और देश का शिक्षित युवा न्यूनतम वेतन पर ठेकेदारी की गुलामी करने के लिए विवश रहे। यह व्यवस्था सीधे-सीधे योग्य युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। एक तरफ कागजों पर नौकरियां खाली रखी गई हैं, तो दूसरी तरफ अपने अधिकारों और रोजगार की मांग करने वाले युवाओं को सड़कों पर लाठियां खानी पड़ रही हैं।

सुशासन का दावा और जमीनी हकीकत

देश की मौजूदा स्थिति उस सुशासन के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है, जिसका प्रचार Modi Government की ओर से लगातार किया जा रहा है। यदि नीतियों में समय रहते सुधार नहीं किया गया और खाली पदों को स्थायी रूप से नहीं भरा गया, तो आने वाले समय में देश का शिक्षित वर्ग पूरी तरह दिहाड़ी मजदूरी के भरोसे रहने को मजबूर हो जाएगा। कागजी दावों और जमीनी हकीकत का यह अंतर साफ उजागर करता है कि देश का युवा आज किस दौर से गुजर रहा है।


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