Supreme Court

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Supreme Court ने संभल हिंसा के कथित मास्टरमाइंड मुल्ला अफरोज के खिलाफ उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा लगाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) को पूरी तरह अवैध करार देते हुए हिरासत रद्द कर दी है। इसके साथ ही Supreme Court ने राज्य सरकार की इस मनमानी कार्रवाई पर कड़ा रुख अपनाते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का भारी-भरकम जुर्माना भी लगाया है।

अदालत का यह फैसला योगी आदित्यनाथ सरकार की उस कार्यशैली पर करारा प्रहार माना जा रहा है, जहाँ बिना किसी ठोस कानूनी आधार के कड़े कानूनों का बेजा इस्तेमाल किया जा रहा है। Supreme Court का यह निर्णय यह स्पष्ट करता है कि कानून का डर दिखाने वाली सरकार खुद प्रक्रियात्मक नियमों की अनदेखी नहीं कर सकती।

नवंबर 2024 हिंसा से लेकर NSA थोपे जाने की टाइमलाइन

नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा में चार लोगों की जान चली गई थी। इसके बाद पुलिस ने मुल्ला अफरोज को साजिश का मुख्य सूत्रधार घोषित कर जनवरी 2025 में गिरफ्तार किया। महीनों जेल में रहने के बाद जब सितंबर 2025 में इलाहाबाद हाईकोर्ट से उसे जमानत मिल गई, तो प्रशासन ने उसे जेल में ही रखने के उद्देश्य से अक्टूबर 2025 में उस पर NSA लाद दिया। इस कार्रवाई का मुख्य आधार सिर्फ पुलिस कस्टडी में दर्ज कराया गया एक बयान बनाया गया, जिसे कानून की नजर में पुख्ता सबूत नहीं माना जाता।

कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी और अधिकारों का हनन

कानून की बुनियादी समझ रखने वाला व्यक्ति भी जानता है कि पुलिस हिरासत में दिया गया कबूलनामा अदालत में टिकता नहीं है। इसके बावजूद गृह विभाग और जिला प्रशासन ने इसी आधार पर एक नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता छीन ली।

Supreme Court के जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने सरकार की इस नीति को शक्तियों का सीधा दुरुपयोग माना। Supreme Court के इस फैसले के बाद अब जनता के टैक्स का 10 लाख रुपया सरकार को जुर्माने के रूप में भरना पड़ेगा, जो प्रशासनिक नाकामियों और लापरवाही का परिणाम है।

नोएडा की घटना और हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी

योगी सरकार के अधिकारियों द्वारा कड़े कानूनों के बेजा इस्तेमाल का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले ग्रेटर नोएडा में एक श्रम आंदोलन से जुड़ी छात्रा पर बिना किसी ठोस वजह के NSA लगा दिया गया था। जब वह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने प्रशासनिक निरंकुशता पर अत्यंत सख्त रुख अपनाया।

हाईकोर्ट ने तत्कालीन डीएम की पर्सनल सैलरी से 5 लाख रुपये काटने और उनके सर्विस रिकॉर्ड में प्रतिकूल टिप्पणी दर्ज करने का आदेश जारी किया था, जिससे प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े हुए थे।

प्रशासनिक कार्यशैली और न्याय प्रणाली पर उठते सवाल

जिस राज्य में प्रशासनिक अधिकारी अपनी मर्जी से नागरिकों पर एनएसए जैसी धाराएं लागू कर रहे हों और जमानत मिलते ही दूसरा कानून थोपकर हिरासत अवधि बढ़ाने की कोशिशें की जा रही हों, वहाँ प्रशासनिक न्यायप्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

संभल से लेकर नोएडा तक के ये मामले दिखाते हैं कि कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करने के बजाय त्वरित और कठोर कार्रवाइयों को प्राथमिकता दी जा रही है। Supreme Court द्वारा बार-बार दिए जा रहे ऐसे निर्देश यह दर्शाते हैं कि निवारक नजरबंदी कानून (Preventive Detention Law) का प्रयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में ही होना चाहिए।

न्यायिक संदेश और भविष्य के लिए कड़ा सबक

Supreme Court का 10 लाख रुपये का यह जुर्माना सिर्फ एक आर्थिक दंड नहीं है, बल्कि प्रशासनिक दमनकारी मॉडल पर एक बड़ा न्यायिक संदेश है। Supreme Court ने अपने इस फैसले से यह साफ कर दिया है कि किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत आजादी को बिना मजबूत और कानूनी आधार के छीना नहीं जा सकता।

Supreme Court का यह रुख राज्य प्रशासन को यह चेतावनी देता है कि भविष्य में बिना ठोस साक्ष्यों के कठोर कानूनों का सहारा लेकर नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन न किया जाए।


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