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RSS यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खिलाफ सात समंदर पार अमेरिका से एक ऐसी रिपोर्ट आई है, जिसने भारत की राजनीति में भूचाल ला दिया है। अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (USCIRF) ने अपनी ताजा रिपोर्ट में सीधे तौर पर RSS के कामकाज के तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आयोग ने स्पष्ट रूप से ट्रंप प्रशासन से सिफारिश की है कि RSS की गतिविधियों को देखते हुए इस पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए।

धार्मिक आजादी के लिए खतरा बना संघ

USCIRF का मानना है कि RSS का एजेंडा भारत के नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह संगठन देश में धर्म के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है। अमेरिका की इस शक्तिशाली संस्था ने RSS की विचारधारा को लोकतंत्र के मूल ढांचे के खिलाफ बताया है।

क्या है USCIRF और इसकी ताकत?

यह समझना जरूरी है कि RSS पर सवाल उठाने वाला यह आयोग कोई मामूली संस्था नहीं है। USCIRF साल 1998 में अमेरिकी कांग्रेस द्वारा बनाया गया एक स्वतंत्र और बेहद प्रभावशाली आयोग है। इसका मुख्य कार्य पूरी दुनिया में धार्मिक स्वतंत्रता की निगरानी करना और अमेरिकी सरकार को विदेश नीति के संबंध में कड़े सुझाव देना है। अब इसी आयोग ने RSS को घेरे में ले लिया है।

‘विशेष चिंता वाले देश’ की श्रेणी में भारत

मोदी सरकार के दौरान भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को तब बड़ा झटका लगा, जब इस रिपोर्ट में भारत को ‘विशेष चिंता वाले देशों’ (CPC) की सूची में डालने की सिफारिश की गई। इसका सीधा अर्थ यह है कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता का ‘गंभीर और निरंतर’ उल्लंघन हो रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि RSS की बढ़ती सक्रियता ही भारत को कूटनीतिक रूप से अलग-थलग कर रही है।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की साख को बट्टा

आज पूरी दुनिया में भारत की साख मिट्टी में मिल रही है और इसका सबसे बड़ा कारण RSS और भाजपा की नफरती राजनीति को माना जा रहा है। जिस देश को ‘अनेकता में एकता’ के लिए सम्मान दिया जाता था, आज उसे RSS की विचारधारा के कारण धार्मिक कट्टरता के केंद्र के रूप में देखा जाने लगा है। यह स्थिति भारत के भविष्य के लिए बेहद चिंताजनक है।

विदेशी निवेश और कूटनीति पर बुरा असर

विदेशी निवेश हो या कूटनीतिक संबंध, हर मोर्चे पर भारत की छवि एक ऐसे देश की बन रही है जहाँ अल्पसंख्यकों के लिए जगह कम होती जा रही है। RSS की नीतियों के कारण दुनिया भर के लोकतांत्रिक देश अब भारत की ओर संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं। यह संगठन भारत के आर्थिक और सामाजिक विकास की राह में सबसे बड़ा रोड़ा साबित हो रहा है।

प्रधानमंत्रियों ने पहले ही भांप लिया था खतरा

इतिहास गवाह है कि RSS की विभाजनकारी सोच को भारत के दूरदर्शी प्रधानमंत्रियों ने बहुत पहले ही समझ लिया था। चाहे वह जवाहरलाल नेहरू हों या पी.वी. नरसिम्हा राव, इन सभी नेताओं ने समय-समय पर RSS की गतिविधियों को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए थे। इन नेताओं का मानना था कि संघ की विचारधारा देश की अखंडता के लिए खतरनाक है।

भारत में लग चुका है कई बार प्रतिबंध

महात्मा गांधी की हत्या के बाद देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और गृह मंत्री सरदार पटेल ने RSS पर कड़ा प्रहार किया था। फरवरी 1948 से जुलाई 1949 के बीच संघ पर पहली बार प्रतिबंध लगाया गया था। उस समय यह स्पष्ट किया गया था कि RSS की जहरीली विचारधारा देश के सामाजिक ताने-बाने को नष्ट कर रही है।

इतिहास का दूसरा अध्याय तब लिखा गया जब इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान जुलाई 1975 से मार्च 1977 के बीच RSS पर दोबारा पाबंदी लगाई गई। आपातकाल के उस दौर में यह माना गया कि संघ की पर्दे के पीछे की गतिविधियां देश की आंतरिक सुरक्षा और लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक बड़ा जोखिम पैदा कर रही हैं।

वहीं, दिसंबर 1992 में जब अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ढांचा ढहाया गया, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने बिना किसी देरी के RSS पर तत्काल प्रभाव से बैन लगा दिया। जून 1993 तक यह संगठन प्रतिबंधित रहा। इन ऐतिहासिक फैसलों से साफ है कि जब भी RSS ने मर्यादा लांघी, उसे कानून की मार झेलनी पड़ी है।

अब निर्णायक कार्रवाई का समय

आज एक बार फिर वही हालात बन रहे हैं जो इतिहास में पहले भी देखे गए हैं। अंतर बस इतना है कि अब RSS पर कार्रवाई की मांग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठने लगी है। नफरत की खेती कभी देश का भला नहीं कर सकती। भारत के लोकतंत्र और संविधान को बचाने के लिए अब वक्त आ गया है कि RSS की इन हरकतों पर पूर्ण विराम लगाया जाए, वरना यह नफरत पूरे देश को राख कर देगी।


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