Election Commission

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Election Commission और केंद्र की मोदी सरकार के बीच के रिश्तों को लेकर एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है जिसने देश के लोकतंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। केरल में एक आधिकारिक पत्र वायरल हुआ है जिसमें Election Commission के हस्ताक्षर वाली जगह पर केरल बीजेपी की मुहर लगी पाई गई है। विपक्ष का सीधा आरोप है कि यह कोई मामूली तकनीकी गलती नहीं है, बल्कि यह इस बात का सबूत है कि Election Commission अब पूरी तरह से मोदी सरकार की कठपुतली बन चुका है। कांग्रेस और टीएमसी ने इसे लोकतंत्र के लिए एक ‘काला दिन’ करार दिया है।

सुप्रिया श्रीनेत को नोटिस: सच दिखाने की मिली सजा

इस विवाद में सबसे खतरनाक मोड़ तब आया जब अपनी इस भारी चूक पर माफी माँगने के बजाय Election Commission ने सच दिखाने वालों को ही डराना-धमकाना शुरू कर दिया। केरल पुलिस के जरिए उन तमाम लोगों को नोटिस भेजे जा रहे हैं जिन्होंने इस मुहर वाले सच को सोशल मीडिया पर उजागर किया था। कांग्रेस की फायरब्रांड नेता और प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत को भी ऐसा ही एक नोटिस थमाया गया है, जिसका खुलासा उन्होंने खुद ‘एक्स’ पर किया है। सुप्रिया का कहना है कि जिस अक्षम्य अपराध के लिए Election Commission को प्रायश्चित करना चाहिए था, उसके लिए वह अब नोटिस का सहारा लेकर आवाज दबाने की कोशिश कर रहा है।

अफसरों की गलती या संस्थानों पर कब्जे का सबूत?

विपक्ष पूछ रहा है कि आखिर एक संवैधानिक संस्था के दफ्तर में सत्ताधारी दल की मुहर क्या कर रही थी? क्या अब Election Commission और बीजेपी के दफ्तर एक ही छत के नीचे से चल रहे हैं? जब इस मामले में चारों तरफ से फजीहत होने लगी, तो Election Commission ने इसे महज एक ‘बाबू की गलती’ बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की। लेकिन सवाल यह है कि क्या इतनी बड़ी संस्था में ऐसी ‘गलती’ मुमकिन है? यह घटना साफ इशारा करती है कि सत्ता और संस्थाओं के बीच का फर्क अब खत्म होता जा रहा है और Election Commission की निष्पक्षता पूरी तरह से खत्म हो चुकी है।

वोट की चोरी और चंडीगढ़ मेयर चुनाव की यादें

राहुल गांधी ने बहुत पहले ही देश को आगाह किया था कि देश में ‘वोट की चोरी’ की बड़ी तैयारी चल रही है। चंडीगढ़ मेयर चुनाव में जिस तरह से अनिल मसीह को बैलेट पेपर से छेड़छाड़ करते पकड़ा गया था, उसके बाद Election Commission के लेटर पर बीजेपी की मुहर का मिलना उस अंदेशे को और गहरा कर देता है। अगर Election Commission वाकई स्वतंत्र होता, तो वह उन अधिकारियों पर गाज गिराता जिन्होंने बीजेपी की सील का इस्तेमाल किया, न कि उन लोगों पर नोटिस की बौछार करता जो देश को सच दिखा रहे थे। यहाँ तो उलटी गंगा बह रही है और संदेश साफ है कि गड़बड़ी पकड़ने वालों को पुलिस का सामना करना पड़ेगा।

विपक्ष का हमला: बीजेपी की ‘बी’ टीम बना आयोग

ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी ने तो खुलेआम Election Commission को बीजेपी की ‘बी’ टीम कह दिया है। मोदी सरकार के कार्यकाल में जिस तरह से एक के बाद एक संवैधानिक संस्थाओं को घुटनों पर लाया गया है, यह ताजा मामला उसी की एक और कड़ी नजर आता है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए और Election Commission जैसी संस्थाएं किसी एक ‘पावर सेंटर’ के इशारे पर काम करने लगें, तो निष्पक्ष चुनाव की उम्मीद धुंधली पड़ जाती है। सुप्रिया श्रीनेत को भेजा गया नोटिस असल में विपक्ष को चुप कराने की एक नाकाम कोशिश है, जिससे यह साफ हो गया है कि दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है।

लोकतंत्र पर प्रहार और जनता का भरोसा

आज जब देश के कई राज्यों में चुनाव की गहमागहमी है, तब Election Commission की कार्यप्रणाली पर उठते ये सवाल बेहद गंभीर हैं। क्या वाकई हमारा वोट सुरक्षित है या फिर संस्थानों पर कब्जे की यह राजनीति लोकतंत्र को निगल जाएगी? Election Commission का यह मुहर कांड और उसके बाद की दंडात्मक कार्रवाई यह साबित करती है कि अब निष्पक्षता केवल कागजों तक सीमित रह गई है। जनता अब इस पाखंड को बखूबी समझ रही है कि किस तरह सरकारी तंत्र का इस्तेमाल सच को दबाने और सत्ता को फायदा पहुँचाने के लिए किया जा रहा है।


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