Rajnath Singh
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Rajnath Singh के जर्मनी दौरे के साथ ही भारत की विदेश नीति में एक बड़ा विरोधाभास सतह पर आ गया है। दुनिया के मंच पर भारत की साख को लेकर अब खुद मोदी सरकार के दो बड़े मंत्रियों के बीच के मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं।
एक तरफ विदेश मंत्री एस. जयशंकर हैं, जो पाकिस्तान की मध्यस्थता पर चिढ़कर भारत जैसे महान राष्ट्र के लिए ‘दलाल’ जैसे विवादित शब्दों का इस्तेमाल करते हैं। वहीं दूसरी तरफ रक्षा मंत्री Rajnath Singh हैं, जो जर्मनी की धरती से वैश्विक शांति के लिए भारत की मध्यस्थता की उम्मीदें जगा रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि सरकार के भीतर संवादहीनता का आलम क्या है।
जयशंकर का विवादित बयान और पाकिस्तान का बढ़ता कद
कुछ दिनों पहले जब पाकिस्तान, अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा था, तब विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक सर्वदलीय बैठक में बड़े ही तल्ख लहजे में कहा था कि भारत कोई दलाल देश नहीं है जो दो देशों के बीच मध्यस्थता करता फिरे। जयशंकर का यह बयान न केवल राजनयिक शिष्टाचार के खिलाफ था, बल्कि इसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को भी गहरी चोट पहुँचाई।
भारत के लिए ‘दलाल’ शब्द का प्रयोग करना यह साफ दिखाता है कि विदेश मंत्री पाकिस्तान की बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता से किस कदर हताश और फ्रस्ट्रेटेड हो चुके थे। लेकिन अब Rajnath Singh के बयानों ने जयशंकर के उस ‘अहंकारी’ स्टैंड की पूरी तरह हवा निकाल दी है।
बर्लिन में राजनाथ सिंह का बड़ा दावा
जर्मनी के दौरे पर गए रक्षा मंत्री Rajnath Singh ने बर्लिन में साफ तौर पर कहा है कि अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जारी तनाव में भारत अभी भले ही सीधे मध्यस्थता नहीं कर रहा, लेकिन भविष्य में इसकी संभावना से कतई इनकार नहीं किया जा सकता। Rajnath Singh ने तो यहाँ तक खुलासा किया कि प्रधानमंत्री मोदी ने दोनों पक्षों से फोन पर विस्तार से बात भी की है। Rajnath Singh के इस रुख ने उन दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं जिनमें मध्यस्थता को ‘दलाली’ करार दिया गया था। अगर सरकार भविष्य की संभावनाओं को देख रही है, तो Rajnath Singh और जयशंकर के बयानों में इतनी बड़ी खाई क्यों है?
मोदी कैबिनेट में बढ़ता वैचारिक घमासान
सवाल यह उठता है कि अगर मोदी सरकार मध्यस्थता की इच्छा रखती है, तो जयशंकर ने इसे ‘दलाली’ क्यों कहा था? क्या मोदी सरकार के मंत्रियों में आपसी तालमेल की इतनी भारी कमी है कि एक मंत्री मध्यस्थता को गाली बताता है और दूसरा मंत्री यानी Rajnath Singh उसे शांति का मार्ग बताते हैं?
जयशंकर का वह बयान न सिर्फ अपमानजनक था, बल्कि आज Rajnath Singh के बयान के बाद वह पूरी तरह से खोखला साबित हो गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि जयशंकर सिर्फ घरेलू राजनीति को साधने के लिए बड़े-बड़े शब्द फेंक रहे थे, जबकि हकीकत में सरकार वही करना चाहती है जिसके लिए Rajnath Singh द्वार खोल रहे हैं।
विदेश नीति पर गहराता संशय
आज देश पूछ रहा है कि आखिर भारत की विदेश नीति किस दिशा में जा रही है? एक राय न होने के कारण भारत इस वैश्विक संकट में कोई मजबूत भूमिका नहीं निभा पा रहा है। जयशंकर जैसे अनुभवी राजनयिक का देश के संदर्भ में ‘दलाल’ शब्द का इस्तेमाल करना हर भारतीय को चुभ रहा है।
Rajnath Singh का बयान साफ संकेत दे रहा है कि जयशंकर का वह दांव पूरी तरह गलत था। उधर पाकिस्तान और तुर्किए जैसे देश अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत की मेज सजा रहे हैं और हमारे मंत्री आपस में ही विरोधाभासी बयान दे रहे हैं। Rajnath Singh द्वारा विदेश मंत्री के बयान को इस तरह दरकिनार करना सरकार के भीतर के भ्रम को उजागर करता है।
जवाबदेही और भविष्य की चुनौतियां
जिस तरह से Rajnath Singh ने जर्मनी में भारत के पक्ष को रखा है, उससे साफ है कि मोदी कैबिनेट के भीतर ही इस मुद्दे पर घमासान मचा हुआ है। इस कूटनीतिक भ्रम का खामियाजा आज देश की वैश्विक साख को भुगतना पड़ रहा है।
जनता देख रही है कि कैसे एक तरफ ‘दलाली’ का नाम लेकर पल्ला झाड़ा गया और अब Rajnath Singh उसी रास्ते पर चलने की बातें कर रहे हैं। क्या मोदी सरकार सिर्फ इवेंट मैनेजमेंट और लफ्फाजी में उलझी हुई है? Rajnath Singh के बयानों के बाद अब प्रधानमंत्री को यह स्पष्ट करना होगा कि आखिर भारत की आधिकारिक नीति क्या है और देश की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाले बयानों पर उनकी क्या राय है।
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