Noida
Table of Contents
Noida से एक ऐसी खबर सामने आ रही है जिसने उत्तर प्रदेश के औद्योगिक गलियारे में हड़कंप मचा दिया है। मजदूरों के हक और सुरक्षा के जो बड़े-बड़े दावे सरकार ने किए थे, वे अब महज चुनावी जुमले साबित होते दिख रहे हैं। औद्योगिक सेक्टर से जुड़ी हालिया रिपोर्ट्स बता रही हैं कि जो वादा हवा में किया गया था, वह जमीन पर उतरने से पहले ही दम तोड़ रहा है। 13 अप्रैल को जब Noida की सड़कों पर कामगारों का गुस्सा फूटा था, तब प्रशासन ने साख बचाने के लिए आनन-फानन में वेतन वृद्धि का भरोसा दिया था, लेकिन आज की हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
उद्यमियों का यू-टर्न और पलायन की धमकी
प्रशासनिक आदेश के बाद अब उद्यमियों ने पूरी तरह से अपने हाथ खींच लिए हैं। उद्योगपतियों का तर्क है कि वेतन में 21 प्रतिशत की वृद्धि और ओवर टाइम का पैसा दोगुना करने से उन पर सीधा 60 प्रतिशत का आर्थिक बोझ पड़ेगा। इससे Noida के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम यानी MSME सेक्टर की नींव पूरी तरह हिल जाएगी। जो मालिक पहले सरकार की हाँ-में-हाँ मिला रहे थे, अब उन्होंने यू-टर्न लेते हुए प्रशासन को सीधी धमकी दे दी है। उद्यमियों का कहना है कि यदि उन पर दबाव बनाया गया, तो वे अपनी इकाइयां यहाँ से बंद कर पलायन कर जाएंगे।
13 अप्रैल की हिंसा और टूटा मजदूरों का सब्र
इस पूरे मामले की जड़ें 13 अप्रैल को हुई उस हिंसा में छिपी हैं, जब अपने शोषण के खिलाफ मजदूरों का सब्र का बांध टूट गया था। Noida के औद्योगिक क्षेत्रों में कामगार अपनी मेहनत की कमाई और बेहतर सुविधाओं की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे। जब उनकी आवाज को दबाने की कोशिश की गई, तो गुस्सा फूट पड़ा। गाड़ियाँ फूंकी गईं और जमकर पत्थरबाजी हुई। उस वक्त सरकार को अपनी कुर्सी डोलती दिखी, तो तुरंत मरहम लगाने के लिए वादों की झड़ी लगा दी गई। Noida की जिलाधिकारी ने बड़े भरोसे के साथ कहा था कि वेतन बढ़ेगा और सुविधाएं मिलेंगी, जिस पर मजदूरों ने यकीन भी किया था।
सरकारी आश्वासन और मजदूरों की ठगी
मजदूर प्रशासन की बातों पर यकीन करके काम पर लौट गए, लेकिन अब वही कामगार खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। अब जब कंपनियों ने पैसे देने से साफ इनकार कर दिया है, तो योगी सरकार इस पर पूरी तरह चुप्पी साधे बैठी है। सवाल यह उठता है कि जब उद्योगपतियों से इस बारे में पहले सहमति नहीं ली गई थी, तो सरकार ने जनता को झूठा आश्वासन क्यों दिया? क्या यह सिर्फ भीड़ को तितर-बितर करने और आंदोलन को खत्म करने की एक सोची-समझी चाल थी? आज Noida का हर मजदूर यही सवाल पूछ रहा है कि उनके पसीने की कीमत आखिर कौन चुकाएगा।
पुलिसिया दमन और मीडिया के साथ अभद्रता
इस मामले में सबसे शर्मनाक पहलू सरकारी दमन का रहा है। प्रदर्शन शांत होने के बाद पुलिस ने सड़कों से किसी को भी उठाकर जेल में डालना शुरू कर दिया। निर्दोष मजदूरों को अपराधी बनाया गया और उनके साथ जानवरों जैसा सलूक किया गया। इतना ही नहीं, जब मीडियाकर्मी इस सच को दिखाने पहुँचे, तो Noida पुलिस उनके साथ भी किसी अपराधी की तरह पेश आई। ‘न्यूज कैप्सूल’ जैसी आवाजों के साथ भी खाकी ने बेहद घटिया बर्ताव किया। पुलिस की लाठियां और गाली-गलौज सिर्फ उन गरीबों और पत्रकारों के लिए थी जो सच की आवाज उठा रहे थे।
पलायन का डर और सरकार की जवाबदेही
अब मामला पूरी तरह से फंस चुका है और Noida की साख दांव पर लगी है। एक तरफ उद्यमी पलायन की धमकी दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ मजदूर फिर से ठगा गया है। बीच में फंसी सरकार अब किसी भी पक्ष को संतुष्ट करने की स्थिति में नहीं दिख रही है। अगर Noida के औद्योगिक क्षेत्र से फैक्ट्रियां पलायन करती हैं, तो यह विकास के दावों पर सबसे बड़ा तमाचा होगा। सरकार को अब जवाब देना होगा कि आखिर कब तक मजदूरों के अधिकारों को चुनावी जुमलों की भेंट चढ़ाया जाता रहेगा और कब उन्हें उनका वास्तविक हक मिलेगा।
Read More
महिलाओं की आड़ में रची गई थी बड़ी साजिश, मोदी सरकार हुई एक्सपोज
मोदी राज में 6.7 मिलियन बच्चों को पूरे दिन नहीं मिलता भोजन, रिपोर्ट में हुआ खुलासा
