Pt Jawaharlal Nehru was real Vishwaguru
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Nehru was real Vishwaguru: आज हम आपको एक कहानी सुनाते हैं, असली विश्वगुरु की कहानी। फर्जी ढोल बजाने वाले की नहीं। ये कहानी करीब 80 साल पुरानी है, लेकिन आज भी उतना ही महत्व रखती है। 1950s का समय था। कोरिया में खूनी युद्ध चल रहा था। एक तरफ संयुक्त राष्ट्र की सेना, मुख्य रूप से अमेरिका के नेतृत्व में। दूसरी तरफ उत्तर कोरिया और चीन। ये जंग दुनिया को परमाणु युद्ध की कगार पर ले आई थी। युद्धविराम की बातें चल रही थीं, लेकिन एक बड़ा अड़ंगा था, करीब 22,000 से 25,000 युद्धबंदी। ये कैदी अपने देश वापस नहीं जाना चाहते थे।
कोरिया और चीन के ये कैदी बने थे समस्या
उत्तर कोरिया और चीन जबरन वापसी की मांग कर रहे थे, जबकि कई कैदी कम्युनिस्ट शासन से बचना चाहते थे।उस वक्त भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू (Nehru) ने एक चतुर प्रस्ताव दिया। Neutral Nations Repatriation Commission (NNRC) बनाया जाए, जिसमें तटस्थ देशों के प्रतिनिधि हों। दोनों पक्ष मान गए, लेकिन शर्त थी कि भारत इसकी अध्यक्षता करे।
Pt Nehru ने लिया फैसला
नेहरू (Nehru) ने तुरंत फैसला लिया और इस काम के लिए भारतीय सेना के दिग्गज कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल केएस थिमैया को चुना। थिमैया कुमाऊं रेजिमेंट से थे। द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिगेड कमांड करने वाले पहले भारतीय अधिकारी थे। इसके अलावा वह 1947-48 में कश्मीर में जोजीला पास की लड़ाई के नायक भी थे। इसीलिए नेहरू (Nehru) ने उन्हें यह असंभव सा लगने वाला मिशन सौंपा। 27 जुलाई 1953 को कोरियाई युद्धविराम समझौता हुआ। थिमैया को NNRC की अध्यक्षता सौंपी गई। भारत ने 6 हजार सैनिकों वाली Custodian Force of India (CFI) भेजी, जिसका नेतृत्व Major General एसपीपी थोरात कर रहे थे।
हल्के हथियार लेकर गए थे भारतीय सैनिक
ये सैनिक सिर्फ हल्के हथियार लेकर गए थे। उनका काम लड़ना नहीं था, बल्कि युद्धबंदियों की सुरक्षा करना और उन्हें स्वतंत्र फैसला लेने देना था। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति भारत की तटस्थ नीति से नाराज थे। इसलिए उन्होंने भारतीय सैनिकों को अपने क्षेत्र में उतरने की इजाजत नहीं दी। इसकी वजह से अमेरिकी हेलिकॉप्टरों से भारतीय सैनिकों को सीधे Demilitarized Zone (DMZ) में उतारा गया।
बारूद का ढेर था हिंद नगर
वहां उन्होंने अपना कैंप बनाया, जिसका नाम रखा गया Hind Nagar। Hind Nagar एक बारूद का ढेर था। 22 हजार कैदी वहां थे। Pro-communist और Anti-communist गुटों के बीच बार-बार दंगे हो जाते थे। पत्थरबाजी, चीख-पुकार आम थी। लेकिन थिमैया ने हार नहीं मानी। कई बार वे हथियारबंद भीड़ के बीच बिना हथियार के घुस जाते। एक बार हजारों कैदियों की भीड़ विद्रोह करने को तैयार थी। थिमैया बीच में जाकर शांतिपूर्वक बैठ गए और बात करते रहे, जब तक तनाव कम नहीं हो गया। Major General थोरात ने भी बिना हथियार के विद्रोही शिविर में घुसकर एक भारतीय अधिकारी को छुड़ाया।
भारतीय सैनिकों ने दिखाया अनुशासन
भारतीय सैनिकों ने जबरदस्त अनुशासन दिखाया। उन्होंने गोली नहीं चलाई, भले ही अपनी जान खतरे में हो। आखिरकार 120 दिनों बाद ज्यादातर कैदियों ने फैसला ले लिया। सिर्फ 88 कैदी अनिर्णीत रहे। यानी उन्होंने कोई फैसला नहीं लिया। फिर नेहरू सरकार इन्हें भारत ले आई। दिल्ली के लाल किले में रखा गया। बाद में ज्यादातर ब्राजील और अर्जेंटीना चले गए, कुछ भारत में ही रह गए, शादी की और भारतीय समाज में घुल-मिल गए। जनरल थिमैया भारत लौटे तो नायक बनकर।
अमेरिकी राष्ट्रपति ने की तारीफ
इस काम के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर ने उनकी तारीफ की। इस सफलता ने साबित किया कि नया स्वतंत्र भारत बिना किसी पक्ष लिए भी दुनिया का नेतृत्व कर सकता है। ये नेहरू (Nehru) की चतुर नीति की असली ताकत थी।ये थी असली विश्वगुरु वाली हरकत। उन्होंने (Nehru) चुपचाप काम किया, ढोल नहीं बजाया। कोई फर्जी प्रचार नहीं करवाया। उन्होंने युद्ध रुकवा दिया, दुनिया को परमाणु संघर्ष से बचाया और भारत को वैश्विक मंच पर सम्मान दिलाया।
और एक आज के हमारे विश्वगुरु हैं, जो हर मौके पर “विश्वगुरु” का ढोल तो बजवाते हैं। लेकिन जब अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच युद्ध छिड़ा, तब ये चुपचाप तमाशा देख रहे थे। यहां असली काम पाकिस्तान जैसा तुच्चा देश कर गया और मोदी जी बस भाषण देते रह गए। यही अंतर होता है असली और दिखावे के विश्वगुरु में।
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