Modi Government
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Modi Government की विदेश नीति और तथाकथित ‘पर्सनल रिलेशन’ पर आज गंभीर सवाल उठ रहे हैं, जिसकी वजह से वैश्विक स्तर पर देश के कृषि निर्यात को बड़े झटके लग रहे हैं। एक समय था जब भारत को दुनिया का ‘अन्नदाता’ कहा जाता था, लेकिन आज हालात यह हैं कि दुनिया के बड़े-बड़े देश हमारे अनाज और फलों को वापस लौटा रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है जैसे दुनिया भर के मुल्कों ने भारत के खिलाफ एक अदृश्य ‘व्यापार युद्ध’ छेड़ दिया है और सरकार इस पर पूरी तरह मौन है।
चीन ने भारत के खिलाफ छेड़ा ‘चावल युद्ध’
चीन एक तरफ हमारी सीमाओं पर आंखें गड़ाए बैठा है और लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक घुसपैठ की कोशिशें करता रहता है। पाकिस्तान के साथ मिलकर साजिशें रचने वाले चीन ने अब भारत के खिलाफ ‘चावल युद्ध’ भी शुरू कर दिया है। चीन ने भारत से भेजी गई गैर-बासमती चावल की पूरे 70 खेपों को ठुकरा दिया है। चीन का सीधा आरोप है कि भारत जो चावल भेज रहा है, उसमें ‘जीएम’ यानी जेनेटिकली मॉडिफाइड फसलें शामिल हैं, जो सेहत के लिए ठीक नहीं हैं।
बीते सिर्फ एक सप्ताह में ही चीन ने चावल की कम-से-कम चार नई खेपों को वापस लौटा दिया है, जबकि इससे पहले मार्च में भी तीन खेपों को रिजेक्ट किया गया था। इस बीच Modi Government द्वारा चीन की एक एजेंसी को विशाखापट्टनम में खुद अपनी टेस्टिंग सुविधा चलाने की मंजूरी देने की तैयारी की जा रही है, जिसे लेकर विपक्ष हमलावर है।
जापान ने भारतीय आमों के आयात पर लगाई रोक
बात सिर्फ चीन जैसे प्रतिद्वंदी देश की नहीं है, बल्कि Modi Government के दौर में अब हमारे सबसे पुराने और भरोसेमंद मित्र देशों के साथ भी व्यापारिक संबंधों में खटास देखी जा रही है। हाल ही में जापान ने भारत के सबसे मशहूर और प्रीमियम फलों, यानी भारतीय आमों के आयात पर पूरी तरह रोक लगा दी है।
जापान का साफ कहना है कि भारत के ट्रीटमेंट सेंटरों पर जो फ्यूमिगेशन, यानी कि कीटाणुशोधन और सुरक्षा से जुड़े उपाय होने चाहिए, उनमें भारी कमियां पाई गई हैं। जो जापान बुलेट ट्रेन से लेकर बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में भारत का साझीदार है, वहां तकनीकी लापरवाही के कारण हमारे फलों को वापस भेजा जाना Modi Government के क्वालिटी कंट्रोल दावों पर सवाल खड़े करता है।
तुर्की और मिस्र ने ठुकराया भारत का गेहूं
अगर पिछले कुछ सालों का रिकॉर्ड उठाकर देखेंगे, तो कृषि निर्यात के मोर्चे पर Modi Government के कार्यकाल में भारतीय कृषि उत्पादों की साख को कई बड़े झटके लगे हैं। याद कीजिए वह दौर, जब रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू हुआ था और दुनिया में गेहूं का भारी संकट पैदा हो गया था। उस वक्त तुर्की जैसे देश में अनाज की भारी किल्लत थी और भारत ने 2022 में तुर्की को गेहूं की खेप भेजी थी। लेकिन तुर्की के अधिकारियों ने यह कहकर भारतीय गेहूं लेने से साफ इनकार कर दिया कि इसमें ‘रुबेला वायरस’ मिला हुआ है।
इसके बाद इसी 55,000 टन गेहूं की खेप को लेकर इजिप्ट (मिस्र) के साथ बातचीत हुई, लेकिन Modi Government के तहत कमजोर क्वालिटी कंट्रोल और ढीली साख को देखते हुए अंत में मिस्र ने भी इस गेहूं को स्वीकार करने से मना कर दिया।
जमीनी स्तर पर क्वालिटी कंट्रोल की अनदेखी
चाहे चीन हो, जापान हो, तुर्की हो या मिस्र, हर जगह भारत के कृषि उत्पादों की साख प्रभावित हो रही है। जानकारों का मानना है कि जब नीतियां सिर्फ हेडलाइंस बनाने और पीआर (PR) चमकाने के लिए की जाती हैं, तो जमीनी स्तर पर क्वालिटी कंट्रोल कमजोर हो जाता है। आज नतीजा सबके सामने है कि वैश्विक बाजार में भारत के कृषि मानकों पर उंगलियां उठ रही हैं। हमारे देश के किसानों की कड़ी मेहनत से उपजाए गए अनाज को अंतरराष्ट्रीय मानकों की कमी बताकर खारिज किया जा रहा है और Modi Government इस व्यापारिक गतिरोध के सामने पूरी तरह लाचार नजर आ रही है।
विपक्ष ने उठाए सरकार की जवाबदेही पर सवाल
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब देश के भीतर भी राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर जवाबदेही तय करने की मांग उठने लगी है। जनता और विपक्ष यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर Modi Government इस वैश्विक फजीहत को रोकने के लिए ठोस कदम कब उठाएगी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में देश के कृषि उत्पादों की गिरती साख न केवल हमारे किसानों को आर्थिक नुकसान पहुंचा रही है, बल्कि भारत की साख को भी प्रभावित कर रही है। ऐसे में Modi Government को अपनी नीतियों की समीक्षा करनी होगी ताकि भविष्य में इस तरह के निर्यात प्रतिबंधों से बचा जा सके।
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