Adani Group
Adani Group द्वारा संचालित मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट के ड्यूटी-फ्री स्टोर से एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने देश की कानून और व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत सरकार की अपनी ही एक जांच में यह बड़ा खुलासा हुआ है कि इस हवाई अड्डे के ड्यूटी-फ्री स्टोर्स में बिना किसी मंजूरी और वैध लाइसेंस के विदेशी निकोटीन पाउच बेचे जा रहे थे।
ड्रग्स विभाग को शिकायत मिलने पर जब छापेमारी की गई, तब नियमों को ताक पर रखकर युवाओं को नशे की लत में धकेलने वाले इस अवैध खेल का पर्दाफाश हुआ। गौरतलब है कि भारत सरकार निकोटीन पाउच को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा मानती है और देश में ई-सिगरेट पर पहले से ही पूर्ण प्रतिबंध लागू है।
कानून को चुनौती और Adani Group की अजीबोगरीब दलील
इस अवैध धंधे के पकड़े जाने के बाद Adani Group ने अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय बेहद अजीबोगरीब तर्क देना शुरू कर दिया है। Adani Group की कंपनी सीधे हाई कोर्ट पहुंच गई और उसने यह दावा कर दिया कि एयरपोर्ट का इंटरनेशनल डिपार्ट्चर एरिया भारत की सीमा शुल्क सीमाओं (कस्टम फ्रंटियर्स) के पार आता है।
कंपनी की दलील है कि इस क्षेत्र में घरेलू नियम और ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट लागू ही नहीं होता है। सीधे शब्दों में कहें तो कोर्ट में यह साबित करने की कोशिश की गई कि एयरपोर्ट के अंदर भारतीय कानून काम नहीं करता है और वहां उनका अपना एक अलग नियम चलता है।
क्या एयरपोर्ट पर भारतीय पुलिस के अधिकार नहीं?
Adani Group के इस तर्क पर कानूनी और दवा उद्योग के विशेषज्ञों ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भारतीय दवा निर्माता कंपनियां सिप्ला और ग्लेनमार्क फार्मास्यूटिकल्स में जनरल काउंसल रह चुके मुरली नीलकांतन ने इस दलील पर कड़ा ऐतराज जताया है। उन्होंने सवाल उठाया कि अगर उस स्टोर के भीतर किसी की हत्या हो जाती है, तो क्या भारतीय पुलिस के पास आरोपी को गिरफ्तार करने की शक्तियां नहीं होंगी? उन्होंने यह भी पूछा कि क्या इस तर्क के आधार पर Adani Group वहां बिना रोक-टोक बंदूकें या गोला-बारूद भी बेच सकता है?
युवाओं की सेहत से खिलवाड़ और विदेशी ब्रांड्स का अवैध आयात
भारत में हर साल तंबाकू और इससे जुड़े हानिकारक उत्पादों के कारण करीब साढ़े तेरह लाख लोग अपनी जान गंवाते हैं। खुद सरकार की रिपोर्ट कहती है कि 18 से 40 साल के युवाओं में इन निकोटीन पाउच की अवैध बिक्री एक बेहद गंभीर और बड़ी चिंता बन चुकी है।
इसके बावजूद, Adani Group के स्टोर पर फिलिप मॉरिस के ‘ज़िन’ और ‘व्हाइट फॉक्स’ जैसे विदेशी ब्रांड्स के पाउच बिना किसी वैध रजिस्ट्रेशन के धड़ल्ले से इम्पोर्ट करके बेचे जा रहे थे। भारत में बिना लाइसेंस ऐसी दवाएं या प्रतिबंधित चीजें बेचने पर कम से कम तीन साल की कैद का प्रावधान है, लेकिन यहाँ मुनाफे के आगे युवाओं की सेहत को दांव पर लगा दिया गया।
मुनाफे का मोह और सरकारी एजेंसियों की ढीली कार्रवाई
इस पूरे मामले में Adani Group की तरफ से कोर्ट में यह दलील भी दी जा रही है कि अगर इन निकोटीन पाउच की बिक्री पर रोक लगी, तो ड्यूटी-फ्री बिजनेस का आकर्षण ही खत्म हो जाएगा। यानी कॉर्पोरेट मुनाफे के सामने देश के कानून की कोई कीमत नहीं समझी जा रही है। ऐसे में मोदी सरकार और प्रशासनिक एजेंसियों की भूमिका पर भी तीखे सवाल उठ रहे हैं। देश में जहां छोटे-मोटे दुकानदारों पर जरा सी चूक के लिए कानूनी डंडा तुरंत चला दिया जाता है, वहीं Adani Group की इस खुली मनमानी पर प्रशासन का रवैया बेहद सुस्त नजर आ रहा है।
अमीर और रसूखदारों के लिए अलग कानून क्यों?
जनता के बीच अब यह संदेश जा रहा है कि देश का कानून सिर्फ आम नागरिकों पर ही सख्ती से लागू होता है, जबकि रसूखदार और अरबपति उद्योगपतियों के लिए नियम-कायदे बदल जाते हैं। जब कोर्ट में इतने गंभीर और संवेदनशील मामले पर दलीलें दी जा रही हैं, तब सरकारी वकीलों और एजेंसियों की तरफ से वह आक्रामकता दिखाई नहीं दे रही है जो होनी चाहिए थी।
ऐसा लगता है कि जब बात ‘खास दोस्तों’ के बिजनेस एम्पायर की आती है, तो नियम खुद-ब-खुद ढीले हो जाते हैं। कोर्ट का अंतिम फैसला जो भी हो, लेकिन इस मामले ने Adani Group की कार्यप्रणाली और कॉर्पोरेट नैतिकता को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर दिया है।
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