Rahul Gandhi

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Rahul Gandhi और देश के युवाओं के जनाक्रोश के आगे एक बार फिर केंद्र सरकार बैकफुट पर दिखाई दे रही है। शिक्षा व्यवस्था की बदहाली और पेपर लीक जैसी गंभीर समस्याओं के खिलाफ 36 दिनों तक चले ऐतिहासिक आंदोलन के बाद आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा। जब Rahul Gandhi खुद छात्रों और युवाओं के समर्थन में सड़कों पर उतरे, तो सरकार के पास कोई जवाब नहीं बचा।

इस भारी जनाक्रोश के दबाव में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को चुपचाप अपना इस्तीफा सौंपना पड़ा। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब जनता का गुस्सा और मजबूत विपक्ष एक साथ आते हैं, तो सत्ता के सबसे बड़े प्रतीकों को भी अपने फैसले बदलने पड़ते हैं।

Rahul Gandhi का साथ और युवाओं का 36 दिनों का संघर्ष

पेपर लीक घोटालों से परेशान युवाओं ने जब अपने भविष्य की रक्षा के लिए मोर्चा खोला, तो उन्हें राहुल गांधी का भरपूर समर्थन मिला। Rahul Gandhi ने संसद से लेकर सड़क तक छात्रों की आवाज को प्रमुखता से उठाया।

सरकार पर युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने के आरोप लगे और यह विरोध इतना व्यापक हो गया कि आखिरकार धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ही सरकार के पास एकमात्र रास्ता बचा।

भूमि अधिग्रहण बिल से लेकर कृषि कानूनों तक Rahul Gandhi का विरोध

यह कोई पहला मौका नहीं है जब Rahul Gandhi के कड़े रुख के कारण सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े हों। साल 2015 में जब भूमि अधिग्रहण अध्यादेश लाया गया था, तब Rahul Gandhi ने इसे ‘सूट-बूट की सरकार’ करार देकर ऐसा राजनीतिक माहौल बनाया कि बिल को ठंडे बस्ते में डालना पड़ा।

इसके बाद तीन कृषि कानूनों के विरोध में भी Rahul Gandhi लगातार किसानों के साथ खड़े रहे, जिसके नतीजे में प्रधानमंत्री को खुद देश से माफी मांगते हुए उन कानूनों को रद्द करना पड़ा।

लेटरल एंट्री और ब्रॉडकास्टिंग बिल पर Rahul Gandhi की घेराबंदी

हाल ही में जब UPSC में बिना परीक्षा के लेटरल एंट्री के जरिए सीधी नियुक्तियों का विज्ञापन जारी हुआ, तब Rahul Gandhi ने इसे सामाजिक न्याय और आरक्षण पर हमला करार दिया। राहुल गांधी के इस आक्रामक रुख के 24 घंटे के भीतर उस विज्ञापन को रद्द कर दिया गया।

ठीक इसी तरह, जब पत्रकारों और यूट्यूबर्स को नियंत्रित करने वाले ब्रॉडकास्टिंग बिल का ड्राफ्ट पेश किया गया, तो राहुल गांधी के कड़े विरोध के आगे सरकार को उस ड्राफ्ट को भी वापस लेना पड़ा।

पेंशन और टैक्स नीतियों पर Rahul Gandhi का असर

सरकारी कर्मचारियों की पेंशन सुरक्षा को लेकर भी Rahul Gandhi ने सरकार पर लगातार दबाव बनाए रखा। इसी राजनीतिक दबाव का परिणाम था कि सरकार को नेशनल पेंशन सिस्टम में बदलाव कर 50 प्रतिशत गारंटीकृत पेंशन वाली ‘यूनिफाइड पेंशन स्कीम’ का ऐलान करना पड़ा।

इसके अलावा, बजट 2024 में मिडिल क्लास पर इंडेक्सेशन हटाने के फैसले पर जब संसद में Rahul Gandhi गरजे, तो सरकार को संशोधन लाकर पुराने प्रॉपर्टी मालिकों को राहत देने का विकल्प देना पड़ा।

Rahul Gandhi के नेतृत्व में विपक्ष का बढ़ता प्रभाव

इन सभी घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि नीतियों पर रोलबैक का यह सिलसिला लगातार जारी है। खुद को अजेय समझने वाली सरकार के हर उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसे जनता ने जनविरोधी माना।

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा तो बस एक ताजा उदाहरण है, जिसने यह साबित कर दिया है कि जब जनता का आक्रोश चरम पर हो और राहुल गांधी जैसा मजबूत नेतृत्व उनके साथ खड़ा हो, तो सत्ता के अहंकार को झुकना ही पड़ता है।


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