Yogi Government
Yogi Government ने सत्ता में आने के बाद से प्रचार-प्रसार के नाम पर रिकॉर्ड तोड़ खर्च किया है। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वित्त वर्ष 2017-18 से लेकर 2024-25 के बीच Yogi Government ने विज्ञापनों और पब्लिसिटी पर 6,811 करोड़ 94 लाख रुपये से अधिक का बजट खर्च कर दिया। इसमें से 83 प्रतिशत यानी 5,658 करोड़ रुपये केवल एडवर्टाइजिंग और विजुअल पब्लिसिटी पर फूंक दिए गए।
इसके अलावा पब्लिकेशन पर 896 करोड़ रुपये, फील्ड पब्लिसिटी पर 220 करोड़ रुपये से अधिक, फिल्म प्रोडक्शन पर 20 करोड़ रुपये, कम्युनिटी रेडियो-टीवी पर 11 करोड़ रुपये और फोटो सर्विसेज पर करीब 8 करोड़ रुपये खर्च किए गए। यह भारी-भरकम राशि जनता की गाढ़ी कमाई और करदाताओं का खून-पसीना थी, जिसे बुनियादी सुविधाओं पर लगाने के बजाय ब्रांडिंग में उड़ा दिया गया।
सरकारी स्कूलों पर लटकता ताला और शिक्षा की अनदेखी
एक तरफ जहां Yogi Government विज्ञापनों में अपनी तस्वीर चमकाने में व्यस्त है, वहीं दूसरी तरफ प्रदेश में शिक्षा व्यवस्था की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। उत्तर प्रदेश में करीब 27 हजार सरकारी स्कूलों को बंद करने की तैयारी चल रही है।
Yogi Government के इस कदम से स्पष्ट है कि जिस धन का उपयोग नए स्कूल बनाने, पुस्तकालय स्थापित करने और अस्पतालों में दवाइयां उपलब्ध कराने के लिए होना चाहिए था, उसे महज सरकारी चेहरे की पॉलिशिंग में लगा दिया गया। नतीजतन, राज्य की गरीब जनता और उनके बच्चे बेहतर और सस्ती प्राथमिक शिक्षा के अधिकार से वंचित हो रहे हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा बजट और प्रचार का गणित
Yogi Government की तरह ही केंद्र सरकार के स्तर पर भी पिछले 11 वर्षों के दौरान प्रचार-प्रसार पर लगभग 6 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं। देश में औसतन हर दिन 25 सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं। नीति आयोग की रिपोर्ट दर्शाती है कि वर्ष 2014-15 में देश भर में जहां 11 लाख से अधिक सरकारी स्कूल संचालित थे, वहीं अब उनकी संख्या घटकर लगभग 10 लाख ही रह गई है। इस तरह पिछले एक दशक में देशभर के करीब 94 हजार सरकारी स्कूलों पर ताला लटक चुका है।
प्राइवेट स्कूल माफिया का बढ़ता कारोबार
जहां एक तरफ Yogi Government और केंद्र सरकार के दौर में सरकारी शिक्षण संस्थान बंद हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्राइवेट स्कूल माफिया का धंधा तेजी से फल-फूल रहा है। आंकड़ों के मुताबिक, देश में निजी स्कूलों की संख्या 2.88 लाख से बढ़कर 3.39 लाख के पार पहुंच गई है। Yogi Government द्वारा सरकारी तंत्र पर ध्यान न देने से आम अभिभावक मजबूरन महंगे निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे शिक्षा एक व्यापार बनती जा रही है।
तकनीकी शिक्षा और इंजीनियरिंग कॉलेजों पर संकट
शिक्षा के इस संकट का असर केवल प्राथमिक स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि उच्च और तकनीकी शिक्षा पर भी पड़ा है। Yogi Government के शासन वाले उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्निकल एजुकेशन (AICTE) के आंकड़ों के अनुसार 58 से अधिक इंजीनियरिंग कॉलेज पूरी तरह बंद हो चुके हैं। इसके अतिरिक्त तकनीकी संस्थानों में चलने वाले 950 से अधिक शैक्षणिक पाठ्यक्रमों को समाप्त कर दिया गया है, जिससे युवाओं के भविष्य पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।
ब्रांडिंग बनाम जनता का वास्तविक विकास
यदि Yogi Government और केंद्र प्रशासन द्वारा विज्ञापनों पर खर्च किए गए इन हजारों करोड़ रुपये का सही उपयोग किया जाता, तो देश और प्रदेश की तस्वीर काफी भिन्न हो सकती थी। Yogi Government को यह समझना होगा कि जनहित के पैसे को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और बुनियादी ढांचे के विकास में लगाने के बजाय केवल हेडलाइन और होर्डिंग्स तक सीमित कर देने से वास्तविक विकास संभव नहीं है। जब तक प्राथमिकताओं को विज्ञापनों से ऊपर नहीं रखा जाएगा, तब तक आम जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए यूं ही संघर्ष करती रहेगी।
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