Rahul Gandhi
Rahul Gandhi की दूरदर्शिता और राजनीतिक चेतावनियों ने एक बार फिर देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। वर्ष 2016 में जब केंद्र सरकार ने डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा देने का दावा किया था, तब Rahul Gandhi ने आशंका जताई थी कि यह व्यवस्था भविष्य में आम जनता और छोटे कारोबारियों से वसूली का जरिया बनेगी।
उन्होंने उस समय डिजिटल वॉलेट के उपयोग पर तंज कसते हुए अपनी बात रखी थी। अब ठीक 10 साल बाद जब 2,000 रुपये से अधिक के मर्चेंट यूपीआई लेनदेन पर 0.4% का चार्ज लागू करने की बात सामने आई है, तो राहुल गांधी की वह बात सही होती दिखाई दे रही है।
नोटबंदी और जीएसटी पर समय से पहले आगाह
यह पहला मौका नहीं है जब Rahul Gandhi की आर्थिक नीतियों पर दी गई चेतावनी सच साबित हुई हो। साल 2016 की नोटबंदी के दौरान Rahul Gandhi ने देश को आगाह किया था कि इससे न तो काला धन समाप्त होगा और न ही जाली नोट बंद होंगे, बल्कि देश की असंगठित अर्थव्यवस्था की कमर टूट जाएगी।
इसके बाद जब जीएसटी लागू हुआ, तो Rahul Gandhi ने इसे ‘गब्बर सिंह टैक्स’ की संज्ञा दी थी। आज देश का छोटा व्यापारी, एमएसएमई क्षेत्र और आम नागरिक जटिल टैक्स दरों तथा पेचीदा नियमों के बोझ तले दबा हुआ महसूस कर रहा है।
चीन सीमा विवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा पर बेबाक रुख
राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति के मोर्चे पर भी Rahul Gandhi ने सरकार की कमियों को उजागर करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जब सरकार सीमा पर स्थिति सामान्य होने का दावा कर रही थी, तब Rahul Gandhi ने खुलकर कहा था कि चीन भारतीय सीमा में घुसपैठ कर चुका है। लद्दाख के चरवाहों और स्थानीय प्रतिनिधियों के बयानों ने बाद में Rahul Gandhi के आरोपों को मजबूती दी। विदेश नीति और सीमा सुरक्षा को लेकर Rahul Gandhi द्वारा उठाए गए सवालों का सरकार के पास आज भी कोई ठोस और सीधा जवाब नहीं है।
कोरोना महामारी और स्वास्थ्य संकट की पूर्व चेतावनी
स्वास्थ्य आपातकाल के समय भी Rahul Gandhi की दूरंदेशी देखने को मिली थी। साल 2020 की शुरुआत में जब देश में कोरोना के शुरुआती मामले सामने आ रहे थे और सरकार ताली-थाली बजाने जैसे आयोजनों में व्यस्त थी, तब Rahul Gandhi ने एक बड़े आर्थिक और मानवीय संकट की चेतावनी दे दी थी। राहुल गांधी ने समय रहते इंटरनेशनल फ्लाइट्स पर रोक लगाने और बुनियादी ढांचे को मजबूत करने का सुझाव दिया था। सरकार की अनदेखी के कारण बाद में देश ने ऑक्सीजन और अस्पतालों के लिए अप्रत्याशित हाहाकार देखा।
कृषि कानून और किसानों के अधिकारों की लड़ाई
कृषि सुधारों के नाम पर लाए गए तीन काले कृषि कानूनों के खिलाफ संघर्ष में भी Rahul Gandhi सबसे आगे रहे। राहुल गांधी ने संसद से लेकर सड़क तक साफ शब्दों में कहा था कि ये कानून देश की खेती और मंडियों को उद्योगपतियों के हवाले करने के लिए बनाए गए हैं। सरकार ने इस चेतावनी को नजरअंदाज किया, लेकिन महीनों चले किसान आंदोलन और सैकड़ों किसानों के बलिदान के बाद अंततः प्रधानमंत्री को खुद सामने आकर उन कानूनों को वापस लेने का ऐलान करना पड़ा।
आर्थिक सांठगांठ और महंगाई का कड़वा सच
चाहे क्रोनी कैपिटलिज्म का मुद्दा हो, शेयर बाजार की अनिश्चितता हो या फिर चुनावों के ठीक बाद एलपीजी, पेट्रोल-डीजल और दूध के दाम बढ़ाने का पैटर्न हो, Rahul Gandhi हर मोर्चे पर सरकार को घेरते आए हैं। पांच राज्यों के चुनाव खत्म होते ही महंगाई का जो बम जनता पर फूटा, उसकी भविष्यवाणी Rahul Gandhi पहले ही कर चुके थे। इन तमाम घटनाक्रमों से यह स्पष्ट होता है कि देश के आर्थिक और सामाजिक हालातों को लेकर राहुल गांधी का आकलन सटीक साबित हुआ है।
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