Delimitation is the real issue
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Delimitation is the real issue: आज देश की राजनीति एक बड़े बदलाव की दहलीज पर खड़ी है। आज से संसद का विशेष सत्र शुरू हो रहा है। इसमें मोदी सरकार तीन बड़े विधेयक पेश करने जा रही है। इनका नाम सुनकर आपको लगेगा कि सब महिलाओं के हित में है, लेकिन असल खेल कुछ और है। महिलाओं के नाम पर मोदी सरकार एक बड़ी साजिश को अंजाम देने जा रही है। बात करेंगे एक-एक करके इन सब पर। सबसे पहले जान लीजिए ये तीनों बिल क्या हैं।
तीन बिल पेश करेगी मोदी सरकार
पहला बिल है केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन बिल, दूसरा है संविधान का 131वां संशोधन बिल और तीसरा और सबसे जरूरी बिल है परिसीमन बिल 2026 (Delimitation)। मोदी सरकार कह रही है कि 2023 का नारी शक्ति वंदन अधिनियम, यानी महिला आरक्षण कानून, अब पूरी तरह लागू करना है। 2029 तक महिलाओं को 33 प्रतिशत सीटें देनी हैं। साथ ही लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाकर 850 करनी है, जो कि अभी 543 हैं। सरकार का कहना है कि बढ़ती आबादी को देखते हुए बदलाव करना जरूरी है। लेकिन असल में यहां सरकार परिसीमन के नाम पर खेल खेल रही है।
क्या है परिसीमन (Delimitation) ?
पहले तो समझ लो परिसीमन क्या चीज है। परिसीमन (Delimitation) का मतलब है लोकसभा और विधानसभा की सीटों की संख्या तय करना और उनकी सीमाएं फिर से खींचना। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती है, वैसे-वैसे कुछ राज्यों को ज्यादा सीटें मिलनी चाहिए। ये काम जनगणना के आंकड़ों पर होता है। पर इसके लिए 10 साल बाद जनगणना होती है। उसी के हिसाब से हर इलाके की आबादी देखकर तय किया जाता है कि कितनी सीटें कहां होंगी।
1971 की जनगणना के बाद ये प्रक्रिया 50 साल से फ्रीज थी। अब 2026 में मोदी सरकार इसे खोल रही है। सरकार का दावा है कि लोकसभा की सीटें 543 से बढ़ाकर 850 कर देंगे तो हर नागरिक का वोट बराबर वजन रखेगा। लेकिन सरकार यहां असल में परिसीमन (Delimitation) के नाम पर उत्तर भारत को फायदा पहुंचाना चाहती है और दक्षिण भारत को सजा देना चाहती है। सरकार बिना नई जनगणना के, सिर्फ 2011 के पुराने आंकड़ों पर परिसीमन करने जा रही है। और यही सबसे बड़ी समस्या है।
2011 का जनगणना के आधार पर करेगी परिसीमन
2011 की जनगणना 15 साल पुरानी हो गई। 2021 में जनगणना होनी थी, वो 5 साल लेट हो गई। डिजिटल जनगणना के आंकड़े 2027 तक आएंगे। फिर बिना ताजा आंकड़ों के परिसीमन (Delimitation) कैसे होगा? इसमें एक और बड़ी समस्या है। दक्षिण के राज्य तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना इन सबने आबादी पर काबू पा लिया। वहां परिवार नियोजन अच्छा चला, शिक्षा बढ़ी, महिलाएं आगे आईं। नतीजा? इन राज्यों की आबादी धीरे-धीरे बढ़ी। वहीं उत्तर के राज्य जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश की आबादी तेजी से बढ़ी। इन राज्यों ने परिवार नियोजन पर फोकस नहीं किया।
क्या होगा नुकसान?
अब अगर परिसीमन (Delimitation) जनगणना के हिसाब से हुआ, तो क्या होगा? उत्तर प्रदेश की सीटें 80 से बढ़कर 140-150 तक हो सकती हैं। बिहार की भी सीटों में भारी बढ़ोतरी होगी। वहीं दक्षिण के राज्यों की सीटें लगभग वैसी ही रहेंगी या बढ़ेंगी भी तो नाम मात्र की। मतलब लोकसभा में दक्षिण की आवाज कमजोर हो जाएगी। इसीलिए दक्षिण के राज्य इसका विरोध कर रहे हैं।
वहां के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि हमने आबादी कंट्रोल की, जनसंख्या स्थिर रखी, तो हमें सजा क्यों मिल रही है? हमने स्कूल बनाए, अस्पताल बनाए, परिवार छोटे रखे। और उत्तर में जहां आबादी अनियंत्रित रही, वहां एक्स्ट्रा सीटें दी जा रही हैं? ये तो दंड है उन राज्यों को जो जिम्मेदार बने।
दक्षिण की आवाज कम होने से होंगे कई नुकसान
अगर लोकसभा में दक्षिण की आवाज कम हुई तो इससे कई बड़े नुकसान होंगे। केंद्र में नीतियां बनेंगी तो उत्तर की आवाज ज्यादा चलेगी। दक्षिण के मुद्दे जैसे भाषा, संस्कृति, जल बंटवारा, आईटी इंडस्ट्री सब पीछे छूट जाएंगे। संसद में सीटें कम हुईं तो केंद्र से मिलने वाला पैसा भी कम हो जाएगा। दक्षिण के राज्य पहले से ही ज्यादा टैक्स देते हैं और कम लेते हैं। अब और कम मिलेगा।
मोदी सरकार को मिलेगा बड़ा फायदा
अब आप सोचेंगे आखिर इससे मोदी सरकार को क्या फायदा है। वो क्यों कर रही है ये सब। तो जवाब है वोट। मोदी सरकार का वोट बैंक मुख्य रूप से हिंदी बेल्ट में है। नॉर्थ के राज्यों में बीजेपी की अच्छी पकड़ है। दक्षिण के राज्यों में बीजेपी की उतनी नहीं चलती। अब अगर नॉर्थ के राज्यों की सीटें (Delimitation) बढ़ गईं, तो बीजेपी की मजबूती और बढ़ जाएगी। इतना ही नहीं, बड़े राज्यों में लोकसभा की सीटें बढ़ जाएंगी और बाकी राज्यों की कम हो जाएंगी। तो सरकार बनाने के लिए पूरे देश से समर्थन की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। अब आप सोचिए, यह बात लोकतंत्र के लिए कितनी घातक है?
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