Noida Police
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Noida Police के अधिकार क्षेत्र में आने वाले इलाकों में पिछले कुछ दिनों से जो मंजर देखने को मिला, उसे सिर्फ एक प्रदर्शन या बवाल कहना गलत होगा। यह उन बेबस मजदूरों की दास्तां है, जिन्होंने अपने हक के लिए आवाज उठाई और बदले में उन्हें पुलिस की लाठियां नसीब हुईं। यह कहानी उस प्रशासनिक तंत्र की है, जिसे सच दिखाने वाले कैमरों से खौफ महसूस होता है। Noida Police की यह कार्रवाई सोशल मीडिया की छोटी सी गलती पर तो बिजली बनकर गिरती है, लेकिन अपनी ही वर्दी के पीछे छिपी बर्बरता को देख अपनी आंखें मूंद लेती है।
मजदूरों की बेबसी और प्रदर्शन की आग
नोएडा के कई सेक्टरों में हजारों मजदूरों ने निजी कंपनियों के खिलाफ वेतन वृद्धि और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर मोर्चा खोल दिया था। इन मजदूरों का गुनाह सिर्फ इतना था कि वे अपनी मेहनत का सही दाम मांग रहे थे। न उनके पास पे-स्लिप होती है, न पहचान पत्र और न ही भविष्य के लिए कोई अनुभव प्रमाण पत्र। कंपनियों के अंदर उन्हें वह सम्मान नहीं मिलता जो एक इंसान का हक है। उन्हें वह खाना परोसा जाता है जिसे जानवर तक नहीं सूंघते।
जब इन मजदूरों का सब्र टूटा, तो उसे बवाल का नाम दे दिया गया। हालांकि आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाएं भी हुईं, जिसके बाद Noida Police ने कार्रवाई करते हुए सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को हिरासत में ले लिया।
डिजिटल कार्रवाई बनाम जमीनी जुल्म
पूरा मामला तब और ज्यादा गरमा गया जब Noida Police ने राष्ट्रीय जनता दल की दो प्रवक्ताओं, प्रियंका भारती और कंचन यादव के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया। उन पर आरोप है कि उन्होंने किसी अन्य स्थान का वीडियो नोएडा का बताकर साझा किया और भ्रामक जानकारी फैलाई।
बेशक, फेक न्यूज पर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन सवाल यह है कि क्या Noida Police की तत्परता सिर्फ सोशल मीडिया तक ही सीमित रहेगी? उन पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई कब होगी जिन्होंने जमीन पर उतरकर निहत्थे मजदूरों पर बेरहमी से लाठियां भांजीं?
वर्दी का अहंकार और संवेदनहीनता
ग्राउंड जीरो पर हालात बेहद डरावने थे। हमने खुद देखा कि किस तरह यूपी पुलिस ने बेबस मजदूरों को निशाना बनाया। क्रूरता की हद तो तब पार हो गई जब लाठी भांजने वाले एक पुलिसकर्मी ने कैमरे के सामने यह कह दिया कि “मजदूरों पर लाठीचार्ज करके मजा आ गया।”
Noida Police की ट्रेनिंग पर यह एक बड़ा सवालिया निशान है कि क्या अब सुरक्षा करने वालों को दर्द में मजा लेना सिखाया जाता है? इस संवेदनहीनता का जवाब कौन देगा और उस वर्दीधारी की जवाबदेही कब तय की जाएगी, जिसने कानून की मर्यादा को ताक पर रख दिया?
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा हमला
इस पूरे विवाद में सिर्फ मजदूर ही नहीं पिसे, बल्कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले पत्रकार भी Noida Police का निशाना बने। कवरेज कर रहे मीडियाकर्मियों को न केवल गालियां दी गईं, बल्कि उन्हें सरेआम धमकाया भी गया। दैनिक भास्कर के पत्रकार के साथ मारपीट हुई और कई अन्य पत्रकारों को घसीटा गया।
News Capsule की टीम भी वहीं मौजूद थी और हमारे साथ भी वही सलूक हुआ जो अन्य मीडियाकर्मियों के साथ किया गया। Noida Police ने ‘जिस्ट’ की एक महिला पत्रकार के साथ भी अभद्र व्यवहार किया। सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि पुलिस ने पत्रकारों के मोबाइल छीनकर रिकॉर्ड किए गए वीडियो खुद ही डिलीट कर दिए, ताकि उनका असली चेहरा दुनिया के सामने न आ सके।
एकतरफा न्याय और सुलगते सवाल
अगर गलत वीडियो शेयर करने पर एफआईआर दर्ज हो सकती है, तो पत्रकारों की निजता भंग करने वाली Noida Police पर कार्रवाई क्यों नहीं? जिस पुलिसकर्मी ने सच के सबूत मिटाए और मजदूरों की चीखों में आनंद लिया, उसकी जांच आखिर कब होगी? Noida Police का एक्शन मोड में आना स्वागत योग्य है, लेकिन यह न्याय एकतरफा क्यों नजर आता है?
क्या पुलिस की गालियों और लाठियों का कोई हिसाब नहीं होगा? आज मजदूरों का खून सड़क पर है और पत्रकारों के कैमरे खामोश किए जा रहे हैं। Noida Police को यह समझना होगा कि फेक न्यूज पर लगाम कसने के साथ-साथ वर्दी की आड़ में छिपी गुंडागर्दी को रोकना भी उन्हीं की जिम्मेदारी है।
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