Modi Government
क्या Modi Government देश को कर्ज के ऐसे दलदल में धकेल रही है, जहाँ से निकलना नामुमकिन हो जाएगा? तथाकथित ‘विश्वगुरु’ का तमगा सिर्फ कर्ज के पैसों पर चमक रहा है? क्या देश में अमृतकाल ऐसे ही आ जाएगा? तो सावधान हो जाइए, ऐसा नहीं होगा, क्योंकि आरबीआई के ताज़ा आंकड़ों ने जो डरावनी हकीकत सामने रखी है, उसे सुनकर आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। महज एक साल में, इस सरकार ने देश पर अरबों डॉलर का नया कर्ज लाद दिया है। क्या यही है विकास का वो मॉडल जिसका ढिंढोरा पूरी दुनिया में पीटा जा रहा है?
आरबीआई के आंकड़ों ने खोली पोल
जानिए कि कैसे देश की आर्थिक स्थिति को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं। 29 जून को रिजर्व बैंक ने जो आंकड़े जारी किए हैं, वो आंखें खोलने वाले हैं। मार्च 2026 के अंत तक भारत का कुल विदेशी कर्ज बढ़कर 762.8 अरब अमेरिकी डॉलर पहुंच गया है। अगर भारतीय रुपये में बात करें तो यह रकम लगभग 72.15 लाख करोड़ रुपये होती है।
सोचिए, इतना बड़ा पहाड़ जैसा कर्ज और सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि सिर्फ पिछले एक साल के भीतर वर्तमान Modi Government और उनके सिस्टम ने देश पर 26.3 अरब डॉलर का नया कर्ज और थोप दिया है।
आम जनता पर टैक्स की मार और कर्ज का खेल
आखिर ये कर्ज लिया किसके लिए जा रहा है? देश की आम जनता तो आज भी महंगाई, बेरोजगारी और टैक्स की मार से त्राहि-त्राहि कर रही है, तो फिर ये अरबों डॉलर जा कहाँ रहे हैं? आरोप तो यही लग रहे हैं कि जनता को सिर्फ मुफ्त का राशन मिल रहा है और कर्ज लेकर कुछ चुनिंदा पूंजीपतियों के हित साधे जा रहे हैं।
तभी तो जीडीपी के मुकाबले विदेशी कर्ज का अनुपात, जो एक साल पहले 19.8% था, वह अब बढ़कर 20.8 प्रतिशत हो गया है। इसी वजह से आर्थिक विशेषज्ञ इस Modi Government की वित्तीय नीतियों पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।
शॉर्ट-टर्म कर्ज और आर्थिक संप्रभुता पर खतरा
खेल यहीं खत्म नहीं होता, इस विदेशी कर्ज में सबसे बड़ा खतरा छुपा है, जो हमारे देश की आर्थिक संप्रभुता को लील सकता है। आरबीआई खुद कह रहा है कि विदेशी मुद्रा भंडार के मुकाबले अल्पकालिक यानी शॉर्ट-टर्म कर्ज का अनुपात बढ़कर 21.6 प्रतिशत हो गया है। यह वो शॉर्ट-टर्म कर्ज होता है जिस पर ब्याज दरें बहुत ज्यादा होती हैं और इन्हें बहुत जल्द चुकाना होता है।
अब आप खुद सोचिए, अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर के मुकाबले अगर हमारा रुपया महज 10% और टूट गया, तो Modi Government के पसीने छूट जाएंगे, क्योंकि तब इस कर्ज को चुकाने में देश का खजाना खाली हो जाएगा। क्या इसी को मजबूत अर्थव्यवस्था कहते हैं?
मनमोहन सिंह के दौर से तुलना और बढ़ता बोझ
यही कारण है कि विपक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बयानों को आधार बनाकर Modi Government को घेरा जा रहा है। याद कीजिए, जब मनमोहन सिंह की सरकार थी, उस वक्त देश पर कुल विदेशी कर्ज महज 446 अरब अमेरिकी डॉलर था। लेकिन पिछले 12 सालों में Modi Government ने अपने कार्यकाल में देश के सिर पर 316 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ डाल दिया है।
यानी दशकों में जितना कर्ज नहीं बढ़ा, उतना इस सरकार ने बढ़ा दिया है। आज देश के कुल विदेशी कर्ज में 55.5 प्रतिशत हिस्सा अकेले अमेरिकी डॉलर का है। यानी डॉलर की कीमत जैसे-जैसे बढ़ेगी, भारत की जनता पर कर्ज का बोझ अपने आप बढ़ता जाएगा।
जनता का सवाल और भविष्य की चिंता
जनता पूछ रही है कि पेट्रोल-डीजल पर भारी टैक्स वसूलने के बाद और हर चीज पर जीएसटी लगाने के बाद भी इस Modi Government को इतना कर्ज क्यों लेना पड़ रहा है? क्या यह कर्ज लेकर सिर्फ बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स और कॉर्पोरेट जगत के बिजनेस चमकाए जा रहे हैं? हकीकत यही है कि कर्ज लेकर घी पीने की इस नीति ने आज देश के हर नागरिक को, चाहे वो पैदा हुआ बच्चा ही क्यों न हो, कर्जदार बना दिया है।
अगर यही हाल रहा, तो वो दिन दूर नहीं जब हमारी अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह जाएगी और तब तक पूंजीपति सारा मुनाफा समेट कर गायब हो चुके होंगे, और रोने के लिए बचेगी सिर्फ इस देश की गरीब जनता। इसलिए अब Modi Government को अपनी प्राथमिकताओं पर फिर से विचार करना होगा।
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