Mongla Port

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Mongla Port: मोदी जी विश्वगुरु होने के बड़े बड़े दावे करते हैं। लेकिन हकीकत में आज इनसे अपने पड़ोसी देश भी संभल नहीं रहे हैं। वो देश जो कभी हमारे अच्छे दोस्त हुआ करते थे आज भारत से दूर होते जा रहे हैं और भारत के दुश्मनों के करीब आ रहे हैं। इसमें एक नाम बांग्लादेश का भी है।

दरअसल खबर है कि बांग्लादेश ने अपना मोंगला पोर्ट (Mongla Port) का प्रोजेक्ट चीन को दे दिया है। अब चीन वहां 110 एकड़ में स्पेशल इकोनॉमिक जोन बना रहा है। चीन के जहाज आसानी से यहां आ जा सकेंगे। माल लोड अनलोड होगा और व्यापार बढ़ेगा चीन का। साथ ही चीन का सामान आसानी से भारत के पूर्वी हिस्से और पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुंचेगा।

भारत के साथ हुआ था समझौता

ये वही पोर्ट है जिसके लिए 2015 में भारत के साथ समझौता हुआ था। भारत को ये पोर्ट मिलने वाला था या कम से कम इसमें बड़ी भागीदारी मिलनी थी। लेकिन अब ये पूरा प्रोजेक्ट (Mongla Port) हमारे हाथ से फिसल गया है। सोचिए एक पड़ोसी देश जो कभी हमारा अच्छा दोस्त था आज हमसे दूर होता जा रहा है और चीन को गले लगा रहा है। ये भारत के लिए बड़ा रणनीतिक झटका है।

मोंगला पोर्ट कोलकाता के बहुत करीब है। ये भारत के पूर्वोत्तर राज्यों असम त्रिपुरा मणिपुर मेघालय आदि के लिए वैकल्पिक समुद्री मार्ग दे सकता था। इससे हमारे कार्गो का ट्रांसपोर्ट आसान और सस्ता हो सकता था। लेकिन अब ये फायदा चीन को मिल गया है। चीन अब बंगाल की खाड़ी में और मजबूत हो गया है। पहले से ही चटगांव ग्वादर हम्बनटोटा पर चीन का कब्जा है। अब मोंगला (Mongla Port) भी उसके हाथ में आ गया है। इससे भारत की समुद्री सुरक्षा पर खतरा बढ़ गया है।

भारत के लिए बढ़ा खतरा

चीन अब भारत के पूर्वी हिस्से से महज 80 किलोमीटर दूर बैठेगा। ये सिर्फ व्यापार का मामला नहीं है। ये अब रणनीतिक मामला है। चीन को अब व्यावसायिक के साथ साथ सैन्य लॉजिस्टिक्स का भी फायदा मिलेगा। चीन के नौसेना के जहाज यहां आकर रुक सकेंगे ईंधन भर सकेंगे और मरम्मत करा सकेंगे। इससे (Mongla Port) चीन को बंगाल की खाड़ी में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने का मौका मिल जाएगा। जरूरत पड़ी तो ये पोर्ट चीन की सेना के लिए लॉजिस्टिक्स बेस का काम कर सकता है। इसके अलावा भारत की पूर्वी सीमा से सिर्फ 80 किलोमीटर दूर होने से चीन को निगरानी और ताकत बढ़ाने में भी आसानी होगी।

फेल हो गई मोदी सरकार की विदेश नीति

ये दिखाता है कि मोदी सरकार की विदेश नीति पूरी तरह फेल साबित हो रही है। 2015 में जब समझौता हुआ था तब सरकार ने इसे बड़ी उपलब्धि बताया था। लेकिन आज 11 साल बाद वो पोर्ट हमारे हाथ से निकल गया है। हालांकि ये अकेला मामला नहीं है। चाबहार पोर्ट का मामला याद है आपको। अमेरिका के दबाव में हमने ईरान के साथ चाबहार पोर्ट का काम धीमा कर दिया। अब वहां भी चीन घुस रहा है।

एक तरफ सरकार विश्वगुरु बनने की बात करती है दूसरी तरफ अपने पड़ोस को संभाल नहीं पा रही है। बांग्लादेश नेपाल श्रीलंका मालदीव सब जगह चीन की घुसपैठ बढ़ रही है। मोदी सरकार बड़े बड़े भाषण देती है लेकिन पड़ोसी नीति में पूरी तरह फेल हो रही है। अब सवाल ये है कि आखिर सरकार क्या कर रही है। क्या विदेश मंत्रालय सो रहा है। क्या पीएमओ में कोई सोच रहा है कि पड़ोसी देशों में हमारी दखल कम क्यों हो रही है। ये नुकसान सिर्फ आर्थिक नहीं है। ये हमारी सुरक्षा का नुकसान है।

पूर्वोत्तर राज्यों की कनेक्टिविटी प्रभावित होगी। व्यापार प्रभावित होगा। और सबसे बड़ी बात चीन की मौजूदगी बढ़ने से हमारी रक्षा व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ेगा। अब सवाल है आखिर मोदी सरकार कर क्या रही है। खाली विदेश घूमने से काम नहीं चलेगा। बड़ी बड़ी बातें करने से पहले छोटे छोटे पड़ोसियों को संभालना सीखिए। वरना विश्वगुरु बनने का सपना अधूरा ही रह जाएगा।


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