PM Modi
PM Modi और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की हालिया मुलाकात के बाद देश के राजनीतिक गलियारों में कूटनीति और राष्ट्रीय आत्मसम्मान को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। एक तरफ जहां वैश्विक स्तर पर भारत और अमेरिका के रिश्तों में कूटनीतिक उतार-चढ़ाव की बातें की जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ पड़ोसी देश पाकिस्तान कूटनीतिक मोर्चे पर खुद को आगे बढ़ाने का दावा कर रहा है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने हाल ही में ईरान और अमेरिका के बीच हुए एक समझौते (MoU) में मध्यस्थ की भूमिका निभाई है, जिसके बाद वहां की सरकार दो देशों के बीच तनाव कम कराने का श्रेय ले रही है। इसके विपरीत, भारत के भीतर से ही सरकार की विदेश नीति और नेतृत्व की शैली पर तीखे सवाल उठ रहे हैं। वीडियो फुटेज के हवाले से आलोचक कह रहे हैं कि अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने भारतीय नेतृत्व का रुख रक्षात्मक और जरूरत से ज्यादा विनम्र दिखाई दे रहा था।
ट्रंप के सामने ‘राग दरबारी’ अंदाज और शब्दों का चयन
इस बैठक के दौरान PM Modi की बॉडी लैंग्वेज और उनके द्वारा इस्तेमाल किए गए शब्दों को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में कड़ी आलोचना हो रही है। आमतौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति से बातचीत के दौरान ‘मिस्टर प्रेसिडेंट’ कहकर संबोधित करने की अंतरराष्ट्रीय परंपरा रही है, लेकिन इस मुलाकात में PM Modi ने अमेरिकी राष्ट्रपति को बार-बार ‘एक्सेलेंसी’ कहकर संबोधित किया।
बैठक के दौरान लगभग छह बार इस शब्द का प्रयोग किया गया, जिसे आलोचक समानता के सिद्धांत के खिलाफ और एक तरह की मानसिक अधीनता या ‘राग दरबारी’ संस्कृति का प्रतीक मान रहे हैं। ऐसा लग रहा था मानो दो संप्रभु देशों के नेता बराबरी के स्तर पर बात करने के बजाय एक-दूसरे के प्रभाव के नीचे दबे हुए हों।
पर्ची कूटनीति व कमजोर संवाद की कमी पर उठे सवाल
आलोचकों का यह भी कहना है कि बातचीत के दौरान PM Modi हाथ में पर्ची थामे नजर आए और बेहद सतर्क व डरे-सहमे ढंग से अपनी बात रख रहे थे। हालांकि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में अपनी मातृभाषा हिंदी का प्रयोग करना कोई गलत बात नहीं है और अनुवादक के माध्यम से संवाद स्थापित करना एक सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन असली समस्या शब्दों की नरमी और संवाद के तरीके में दिखी।
वैश्विक मंच पर जहां भारत को अपनी 56 इंच की छाती और आत्मनिर्भरता की धमक दिखानी चाहिए थी, वहां PM Modi का लहजा बेहद रक्षात्मक लग रहा था। कूटनीति में शिष्टाचार और नरमी जरूरी है, लेकिन देश के स्वाभिमान की कीमत पर इतनी अधिक विनम्रता दिखाना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
तीन भारतीय नाविकों की मौत और सरकार की कथित चुप्पी
इस पूरे घटनाक्रम के बीच पश्चिम एशिया के संकट में भारत के तीन नाविकों की जान चली गई, जिससे उनके परिवारों में कोहराम मचा हुआ है। इसके बावजूद अमेरिकी प्रशासन के सामने PM Modi ने इस गंभीर मुद्दे पर दृढ़ता से भारत का पक्ष रखने के बजाय ट्रंप की तारीफों के पुल बांधने में अधिक समय बिताया।
जनता अब सवाल पूछ रही है कि जब देश के नागरिकों की जान पर बन आई हो, तब PM Modi अमेरिकी राष्ट्रपति की कथित उपलब्धियों पर कसीदे क्यों पढ़ रहे थे? भारत जैसे मजबूत देश को यह साफ करना चाहिए था कि हमारी सेना किसी भी चुनौती से निपटने के लिए तैयार है और अमेरिका की कोई भी कूटनीतिक गलती हमारे द्विपक्षीय संबंधों को हमेशा के लिए प्रभावित कर सकती है।
पाकिस्तान की उभरती कूटनीति और भारत के लिए चुनौती
दूसरी तरफ, अगर हम क्षेत्रीय संतुलन को देखें तो पाकिस्तान इस स्थिति का फायदा उठाकर अमेरिका के करीब जाता दिख रहा है। पाकिस्तानी सेना प्रमुख को हाल ही में अमेरिका का विशेष आमंत्रण मिला, जहां ट्रंप प्रशासन द्वारा उनकी कूटनीति की सराहना की गई। मीडिया के एक वर्ग का मानना है कि क्या PM Modi के नेतृत्व वाली सरकार की तुलना में आज पाकिस्तान की विदेश नीति अधिक रणनीतिक और आक्रामक साबित हो रही है?
वैश्विक स्तर पर ‘विश्व गुरु’ बनने का सपना देखने वाले भारत के लिए यह स्थिति बेहद चिंताजनक है, जहां PM Modi को विदेशी नेताओं के सामने भारत की प्राचीन सभ्यता के गौरव के अनुरूप मजबूती से खड़ा होना चाहिए था।
राष्ट्रीय आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की असली कसौटी
अंततः, यह पूरा घटनाक्रम देश के आत्मसम्मान और संप्रभुता पर गहरे सवाल खड़े करता है। भारतीय नागरिकों का मानना है कि PM Modi को विदेशी दौरों पर देश के स्वाभिमान को सर्वोपरि रखना चाहिए। कूटनीतिक एक्सपर्ट्स का भी मानना है कि इस वीडियो में भारतीय पक्ष का रवैया किसी शहंशाह के दरबार में खड़े मुलाजिम जैसा प्रतीत हो रहा था, जो स्वतंत्र भारत की छवि को धूमिल करता है।
आज हर भारतीय को PM Modi से यह सवाल पूछना चाहिए कि क्या यही वह आत्मनिर्भर भारत है जिसका वादा किया गया था? हम दुनिया की सबसे पुरानी और गौरवशाली सभ्यता हैं, इसलिए हमें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घिघियाने या झुकने के बजाय अपनी शक्ति और सिद्धांतों के साथ अडिग रहना होगा।
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