मोदी सरकार ने एक और सरकारी कंपनी- IMPCL बेच दी.
IMPCL Sold: मोदी सरकार ने एक और सरकारी कंपनी बेच दी. कंपनी के कर्मचारी एक जून से ही धरने पर बैठे हैं। मोदी सरकार के इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। दरअसल 26 मई को मोदी सरकार ने इंडियन मेडिसिन फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड यानी आईएमपीसीएल को मात्र 121 करोड़ रुपये में दिल्ली की प्राइवेट कंपनी स्काईमैप फार्मास्युटिकल्स को बेच दिया। जबकि इसकी नेटवर्थ ही 145 करोड़ रुपये थी।
क्या परेशान है IMPCL के कर्मचारी?
अब कंपनी के कर्मचारियों के साथ साथ स्थानीय लोग भी परेशान हैं. क्योंकि इस कंपनी से आसपास के सैकड़ों ग्रामीण परिवारों की कमाई होती थी। मोदी सरकार के इस फैसले से सब दुखी हैं। वो नेता विपक्ष राहुल गांधी से मांग कर रहे हैं कि वो उनकी आवाज उठाएं। इसके पहले दिसंबर 2024 में भी कंपनी के कर्मचारी राहुल गांधी से मिल चुके हैं। तभी उन्होंने राहुल गांधी को बताया था कि सरकार इसे बेचना चाहती है। और आज आखिरकार सरकार ने इसे बेच ही दिया।
आयुर्वेदिक और यूनीनी दवाइयां बनाती थी कंपनी
बता दें कि IMPCL आयुर्वेदिक और यूनानी दवाइयां बनाती है। कंपनी जितने भी उत्पाद करती है उसका कच्चा माल आसपास के गांवों से खरीदती है। इसी वजह से ये कंपनी केवल अपने कर्मचारियों के लिए ही नहीं, बल्कि आसपास के सैकड़ों ग्रामीण परिवारों के लिए भी आजीविका का एक बड़ा स्रोत थी।
फैक्ट्री में उपयोग होने वाले गोबर के उपले, लकड़ी और विभिन्न जड़ी बूटियों की आपूर्ति स्थानीय स्तर पर की जाती थी। कुल करीब 500 उत्पादों में से कई चीजें लोकल मार्केट से ली जाती थीं। यानी ग्रामीणों और वहां के छोटे कारोबारियों को इससे नियमित रूप से कमाई होती थी। पर अब सब कुछ खतरे में है।
IMPCL का इतिहास
ये भी जान लीजिए कि IMPCL की कहानी 1978 में उत्तराखंड के अल्मोड़ा में शुरू हुई थी। 12 जुलाई 1978 को वन विभाग की 40 एकड़ जमीन पर इसकी स्थापना हुई। ये देश की एकमात्र बड़ी सरकारी कंपनी थी जो आयुर्वेदिक और यूनानी दवाएं बनाती थी। इसके पास 1200 तरह की औषधियों का लाइसेंस था। वर्तमान में ये 575 तरह की दवाएं बना रही थी और इन्हें देश के केंद्रीय अस्पतालों, रिसर्च संस्थानों, आर्मी हॉस्पिटल्स, सीजीएचएस और राज्य अस्पतालों को सप्लाई करती थी।
सालों से प्रॉफिट में थी कंपनी
बता दें कि ये कंपनी मिनी रत्न का दर्जा रखती थी। पिछले कुछ सालों में ये लगातार प्रॉफिट में थी। आप आंकड़े देखिए। 2019-2020 में कंपनी का प्रॉफिट 45 लाख था। 2020-21 में 1105 लाख हुआ। 2021-22 में मुनाफा 3376 लाख तक पहुंच गया यानी करीब 75 गुना बढ़ोतरी देखी गई। फिर 2022-23 में 2081 लाख का मुनाफा हुआ और 2023-24 में 1281 लाख का। नेट वर्थ 2019-20 में 75 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में 145 करोड़ हो गई। कंपनी ने कभी घाटा नहीं दिया। हमेशा फायदे में रही।
हालांकि, तब भी मोदी सरकार ने इसे (IMPCL) बेच दिया। जबकि सरकार के इस फैसले का विरोध बीजेपी के नेता तक कर रहे थे। केंद्र सरकार में पूर्व मंत्री और भाजपा सांसद अजय भट्ट ने आईएमपीसीएल का निजीकरण रोकने के लिए पीएम मोदी सहित तमाम मंत्रियों को दर्जनों चिट्ठियां लिखीं। उन्होंने बताया कि देशवासियों के इलाज में IMPCL की क्या भूमिका है। यह भी जानकारी दी कि 1983 से आज तक आईएमपीसीएल प्रॉफिट में रही है। पर सारे विरोधों के बावजूद मोदी सरकार ने कंपनी बेच दी। अब उत्तराखंड के लोग कह रहे हैं कि यह सौदा उत्तराखंड में पलायन बढ़ाने वाला है। हजारों लोगों के रोजगार को खाने वाला है।
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